विस्फोट के विस्फोटित होने के बाद का लावा अभी ठण्डा नहीं हुआ है, गुत्थी सुलझती नहीं लग रही है, शायद कुछ और सामने आए।
तब तक देखते हैं कि सेब पर बेतार टाटा इण्डिकॉम (वही काजोल वाला) कैसे लागू किया जा सकता है। अगर आप सेब का इस्तेमाल नहीं करते, या आपके पास ब्रोडबैंड है, तो आपको इस लेख को पढ़ के कुछ खास मिलेगा नहीं। यह लेख ऑन्लाइन गरीबी रेखा से नीचे वालों के लिए है। हाँ सेब की लुभावनी तस्वीरें आप फिर भी देख सकते हैं।
सबसे पहले तो आपको टाटा इण्डिकॉम का प्लग टु सर्फ़ खरीदना होगा। उस खरीद फ़रोख्त के पचड़े में नहीं पड़ रहा हूँ, मान के चलते हैं कि वह आपके पास पहले है। न हो तो बताएँ। यह प्लग टु सर्फ़ सिर्फ़ एक बेतार यूऍसबी मॉडेम है, जो कि कुछ कुछ तम्बाखू और चूना रखने की डिब्बी के आकार का होता है, काले रंग की प्लास्टिक का। इसका ढक्कन खोल के यूऍसबी का सिरा चालू सेब में घुसेड़ें।
आपको यह सन्देश दिखना चाहिए। अगर नहीं दिख रहा तो इसका मतलब है कि आपकी डिब्बी में कुछ गड़बड़ी है, किसी विण्डोज़ मशीन में (जिसमें सीडी स्थापित हो) लगा के जाँच लें।
इसके बाद आप सिस्टम प्रिफ़रेंसे़ के अन्तर्गत नेट्वर्क में जाएँ।
यहाँ पर लोकेशन के बगल वाले बक्से पर चटकाने पर आपको क्वाल्कॉम का विकल्प भी दिखेगा। उसे चुन लें।
आपसे नाम पूछा जाएगा, अपनी पसन्द का नाम दें।
इसके बाद, प्रयोक्ता नाम, internet, कूटशब्द भी internet और फ़ोन नंबर #777 दें। हर डिबिया के लिए यही नाम,नम्बर हैं, कुछ अलग नहीं है।
शो मॉडम स्टेटस इन मीनू बार पर सही का निशान लगाएँ।
बस काम हो गया। अब, जब भी काम चालू करना हो, ऊपर लगे फोन पर चटका लगा के चालू करें और इच्छानुसार बन्द करें।
यह है भी काफ़ी तेज़, ब्रोड्बैण्ड से कुछ ही कम धीमा है। सेवा काफ़ी पसन्द आई। आप भी आजमा के देखें, मतलब अगर मेरी तरह मजबूर हों तो। विण्डोज़ और लिनक्स के निर्देश और सीडी तो इसके साथ ही आते हैं, लिनक्स पर मैंने अभी आजमाया नहीं है।
उपरोक्त जानकारी मुझे विष्णु से मिली, उन्हें धन्यवाद।
अन्ततः विस्फोट के विस्फोट के बारे में फिर से - आप में से जिन्होंने भी विस्फोट वाले मसले पर अपनी राय दी है उन सबको धन्यवाद। यह निश्चित है कि "विरोधी संकलक" का संचालक होने के नाते मेरी हर बात उसी चश्मे से देखी जाएगी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि जो मैं सही समझता हूँ, वह न कहूँ। पुनः धन्यवाद। उसके बारे में फिर।
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10:50 बजे आलोक द्वारा।ताज़ी खबर है कि विस्फोट नामका चिट्ठा जो कि सञ्जय तिवारी जी चलाते हैं, अब ध्वस्त हो चुका है, विस्फोटित हो चुका है।
स्थल पर कोई कारण नहीं लिखा है कि ऐसा वास्तव में क्यों हुआ। स्थल पर मात्र इतनी जानकारी है, कि विस्फोट का चिट्ठा अब स्थायी रूप से बन्द हो चुका है (जी हाँ, स्थायी, अस्थायी नहीं)।
इतना ही नहीं विस्फोट पर लिखे सभी लेख मिटा दिए गए हैं।
क्यों हुआ यह सब? जानने की कोशिश करते हैं।
विस्फोट प्रारम्भ में सञ्जय तिवारी जी का निजी चिट्ठा था। सामयिक विषयों पर, और खासतौर पर पूर्वी उत्तर प्रदेश के जन जीवन के बारे में यहाँ लिखे लेख कई लोग चाव से पढ़ते आए हैं।
कुछ दिनो पूर्व सञ्जय जी ने विस्फोट को साथिया चिट्ठे की शक्ल देने का फैसला लिया।
लिखने वाले दर्जनों तैयार हो गए। यह सञ्जय जी की मेहनत और स्वभाव का ही फल है कि इतने लोग अपने आपको विस्फोट से जोड़ना चाहते थे।
कई लोगों ने विस्फोट पर लिखना शुरू किया। लेखों की सामग्री में कुछ खास बदलाव नहीं था, न अश्लीलता, न गाली गलौज। प्रासंगिक विषयों पर लेख, पहले की ही तरह। संजय जी ने बहुत सोच समझ के ही साथिया चिट्ठे की सदस्यता के लिए आमन्त्रण भेजे। इतना ही नहीं, आमन्त्रण खुला रखा। साथ ही, विस्फोट के स्थल से सभी विज्ञापन भी हटा दिए, यह भी लिखा कि वे विज्ञापन महान बनने के लिए नहीं हटा रहे हैं, बल्कि इसलिए हटा रहे हैं कि सामूहिक चिट्ठे में आय का बँटवारा कैसे हो, यह फैसला करना संभव नहीं है। उनके इस कदम की भी सबने दाद दी।
एक दिन अचानक – एक निजी सङ्कलक पर - हिन्दी चिट्ठों के चार से अधिक संकलकों में से एक - पर विस्फोट दिखना बंद हो गया।
अब ब्लॉगवाणी के चरित्र के बारे में कुछ गम्भीर बातें तो मैं पहले ही कर चुका हूँ, लेकिन यह लेख किसी निजी संकलक की सम्पादकीय नीति के बारे में नहीं है। देखते हैं कि इस मसले में आगे क्या हुआ।
बतङ्गड़ पर एक लेख छपा। लेख में आह्वान था, कि ये एग्रिगेटर इस तरह के शर्मनाक धंधे कब बंद करेंगे? सही बात है, कि अकेली मछली पूरा तालाब गंदा करती है, गलती की एक एग्रिगेटर ने, गाली मिली सभी को।
उसपर निजी संकलक के सञ्चालक महोदय का खुलासा आया कि फलाँ कारणों से यह चिट्ठा हटा दिया गया है। ठीक है, उनकी मर्ज़ी, वह तो हैं ही स्वान्तः सुखाय। सुखी रहें।
पर उसके कुछ ही मिनट बाद यह लेख भी बतङ्गड़ से गायब हो गया।
इतना ही नहीं, निजी संकलक से भी गायब हो गया।
निश्चित रूप से बतङ्गड़ से बतङ्गड़ महोदय ने हटाया होगा - सञ्चालक तो वही हैं, कोई और तो है नहीं। और निजी संकलक से, निजी संकलक के सञ्चालक ने।
जब उड़ाना ही था, तो लेख लिखने की आवश्यकता क्या थी, लेकिन वह तो बतङ्गड़ जी ही जानें।
अगले दिन सञ्जय तिवारी जी ने क्षुब्ध हो कर विस्फोट की सारी प्रविष्टियाँ उड़ा दीं।
कुल मिला के बात यह हुई -
एक निजी संकलक के सञ्चालक को अज्ञात कारणों से एक चिट्ठे के लेख पसंद नहीं आए, या शायद लेखक पसंद नहीं आए। या कारण शायद कुछ और हो। या शायद कोई कारण न हो। निजी है भई। पर कारण है अज्ञात। इस वजह से निजी संकलक ने चिट्ठा अपने यहा से हटा दिया।
इस घटना पर एक और लेखक ने टीका टिप्पणी की। कुछ समय बाद इसी लेखक ने भी अपना लेख उड़ा दिया। पहले लिखा, और फिर उड़ा दिया। बिना कारण बताए।
इस सब से त्रस्त चिट्ठा सञ्चालक ने अपना चिट्ठा उड़ा दिया।
समझ नहीं आता है कि जब निजी संकलक वालों ने कह ही दिया है कि उनका सङ्कलक निजी, स्वान्तः सुखाय है, सर्वव्यापी नहीं है, वसुधैव कुटुम्बकम् नहीं है, तो उनसे कोई उम्मीद क्यों? इतना निश्चित है कि अगर निजी संकलक के सञ्चालक की पसन्द के लेख, उनकी पसन्द के लेखक वापस विस्फोट पर आ जाएँ तो विस्फोट वहाँ दुबारा आ जाएगा।
लेकिन यह हाल तब है जब तीन और संकलकों पर विस्फोट लगातार छप रहा था। चार में से तीन संकलकों पर विस्फोट छप रहा था, और मुझे विश्वास है कि यदि सञ्जय जी अपने चिट्ठे के आँकड़े देखते तो वह पाते कि कई लोग विस्फोट पर सीधे आते हैं, संकलकों के जरिए नहीं।
सोचिए यह हाल है हमारे अग्रणी लेखकों का तो शुरुआती दौर से गुज़र रहे लेखकों का क्या हाल होता होगा? वह लोग कितने चिट्ठे बनाते होंगे और प्रोत्साहन न मिलने पर छोड़ देते होंगे, मिटा देते होंगे?
सञ्जय जी ने एक भी बार नहीं सोचा कि और संकलक - नारद, हिन्दी ब्लॉग्स और मेरे द्वारा सञ्चालित चिट्ठाजगत – मरे नहीं हैं। निष्पक्ष हैं। व्यक्तिगत खुन्न्स के लिए प्रविष्टियों में बदलाव नहीं करते। प्रविष्टियों के क्रमाङ्कन में हेर फेर नहीं करते। कड़वी दवा पिलाने वाले चिट्ठों को गायब नहीं करते। निजी नहीं हैं, अपनी सार्वजनिक ज़िम्मेदारी मानते हैं और समझते हैं।
आप संकलकों के ग्राहक हैं, संकलक कुछ गलत करते हैं तो आप उसके बारे में आवाज़ उठाने से डरते क्यों हैं? उनके विकल्पों को चुनने से क्यों डरते हैं? पूर्णतः संकलक मुक्त क्यों नहीं हो जाते? उनके सामने घुटने क्यों टेकते हैं? निजी संकलकों के विकल्पों को प्रचारित क्यों नहीं करते?
आप सोच रहे होंगे कि यह देखो निजी संकलक का प्रतिद्वन्द्वी लोहा गरम देख के वार कर रहा है। प्रतिद्वन्द्विता है भई, बिल्कुल है, पर उसका फ़ायदा तो पाठक और लेखक को होना चाहिए न? वह क्यों नहीं हो रहा? और इसके लिए जिम्मेदार कौन है?
आप लोग क्यों एक ही निजी संकलक को भगवान बनाए बैठे हैं? क्यों उसे चने की झाड़ पर चढ़ाए बैठे हैं? रवि रतलामी जी कहते हैं कि अच्छा लिखने वाले को किसी संकलक की ज़रूरत ही नहीं है।
उससे एक कदम आगे जा के मैं यह कहता हूँ कि इस प्रकार की करतूतों को सामने लाना ज़रूरी है, बिना इस बात से डरे कि मैं सङ्कलक की बुराई करूँगा तो मेरे चिट्ठे का क्या होगा। अगर मेरे इस लेख की वजह से नौ-दो-ग्यारह, किसी निजी संकलक से नौ दो ग्यारह हो जाता है, तो हो जाए। मैंने चिट्ठा लिखना जब शुरू किया था तो संकलक का कहीं नामोनिशान नहीं था। मुझे नहीं लगता कि एक निजी संकलक से मेरा लेख हट जाएगा तो मेरा चिट्ठा लिखना बेकार हो जाएगा।
फ़ुरसतिया जी कह चुके हैं, चिट्ठा ही नहीं रहेगा तो संकलक क्या करेगा?
ज्ञान जी कह चुके हैं, मैं संकलकों में प्रतिद्वन्द्विता का अनुमोदन करता हूँ, क्योंकि इससे गुणवत्ता बढ़ेगी।
पर ऐसा लगता तो नहीं। इसका ज़िम्मेदार कौन है? क्या संकलक वाले हैं? या उनके पाठक? या लेखक?
आपको क्यों लगता है कि किसी के निजी संकलक पर आपका लेख नहीं छपेगा तो आपका लेख लिखना बेकार है? यही सवाल है आपका जिसका जवाब मैं आपसे टिप्पणियों में चाहता हूँ।
ध्यान दें, मैं किसी टिप्पणी को मिटाता नहीं हूँ, और न ही बेनामी टिप्पणियाँ खुद करता हूँ। जो लिख रहे हैं, सोच समझ के लिखें, वह मिटेगा नहीं।
हाँ इस बहाने बतङ्गड़ जी की प्रतापगढ़ वाले धारावाहिक वृत्तान्त पढ़े, बहुत बढ़िया लगे, आप भी पढ़िएगा।
सवाल दोबारा –
1. क्या आपको लगता है कि आपका लेख किसी के निजी संकलक पर नहीं छपेगा तो आपका लिखना बेकार है?
2. क्या दूसरे सङ्कलक, यानी नारद, हिन्दी ब्लॉग्स, और चिट्ठाजगत इतने गए गुज़रे हैं कि उन्हें बन्द हो जाना चाहिए?
3. आप विस्फोट के सञ्चालक होते तो इस स्थिति में क्या करते? या दूसरे शब्दों में, यदि आपके साथिया या निजी चिट्ठे के साथ ऐसा होता तो आप क्या करते?
जवाब दीजिए, आप जवाबदेह हैं। कृपया निजी संकलकों की सम्पादकीय नीति की चर्चा अन्यत्र करें, स्वान्तः सुखाय नीति की चर्चा के लिए यह लेख नहीं है, केवल उपरोक्त तीन सवालों का जवाब माँगने के लिए है।
Labels: तकनीक
19:36 बजे आलोक द्वारा।१. जब भी आप गूगल पर खोज करते हैं, तो हिंदी वाले गूगल का इस्तेमाल करें। इसे लागू करना तो बहुत आसान है, बस एक बार प्रिफ़रेंसेज़ या वरीयताएँ में जा के हिंदी चुनें। बस एक बार। इसी तरह जब भी किसी साइबरकैफ़े या दोस्त के यहाँ गूगल पर खोज करें, तो भी हिन्दी वाले गूगल का इस्तेमाल करें। समय लगा - ३० सेकिंड।
२. जब भी आप जीमेल का इस्तेमाल करते हैं, तो हिन्दी वाले जीमेल का इस्तेमाल करें। इसे लागू करना भी बहुत आसान है। जीमेल में सेटिंग्स पर जा के भाषा बदलें। जब भी आप किसी मित्र को जीमेल का इस्तेमाल करते देखते हों, तो उन्हें बताएँ कि वे इसे हिन्दी में बी बदल सकते हैं। समय लगा – ३० सेकिंड।
३. जब भी आप किसी को डाक लिखते हैं, तो नीचे दस्तखत –हस्ताक्षर – सिग्नेचर - की जगह होती है, यह भी आप जीमेल में सेटिंग्स के जरिए बदल सकते हैं। वहाँ पर हिन्दी में कुछ छोटा से लिखें, अपना नाम, अपना चिट्ठे का नाम, और अपने या किसी और स्थल की कड़ी जो हिन्दी में हो। इससे जो भी आपकी चिट्ठी पढ़ेगा – भले ही वह हिन्दी में नह हो – पर दस्तखत हिंदी में होने से लोगों में उत्सुकता बढ़ेगी। यह आपको एक ही बार करना होगा। समय लगा – ३० सेकिंड।
४. अपने फ़ोन की फ़ोन सेटिंग में देखें कि हिंदी की सुविधा है या नहीं। अगर है तो हिंदी लागू करें। इसी तरह अगर आपके दोस्तों के फ़ोन में हिंदी की सुविधा है तो उन्हें भी बताएँ कि वह फ़ोन की शक्ल हिंदी वाली कर सकते हैं। हिंदी एक ही बार लागू करनी होगी। जब भी आप कोई नया मोबाइल खरीदते हैं तो दुकानदार से यह ज़रूर पूछें कि इसमें हिंदी पढ़ना लिखना हो सकता है या नहीं। लोगों के पास मोबाइल तो होते हैं पर हिंदी न होने की वजह से डाक वगैरह नहीं जाँचते। तो कीजिए फ़ोन सेटिंग से हिंदी लागू। समय लगा – ३० सेकिंड।
बस इतना ही। सिर्फ़ दो मिनट। कोई सरकारी अनुदान नहीं चाहिए। कोई हिंदी का रोना रोने वाले लेख नहीं चाहिए। चाहिए तो सिर्फ़ आपके दो मिनट। समय शुरू होता है अब।
आप और मैं नहीं करेंगे तो आज से पाँच साल बाद आपका सब्ज़ी वाला कैसे करेगा? उसे हिंदी आती है, पर कंप्यूटर का इस्तेमाल करने के लिए हिंदी आना काफ़ी है, यह खबर उस तक पहुँचेगी नहीं।
दो मिनट में यह सब कर लेने के बाद टिप्पणी करके बताइएगा ज़रूर, यूँ ही नौ दा ग्यारह न होइएगा!
ताकि कोई यह न कह सके कि हिंदी सिर्फ़ कवियों और पत्रकारों की भाषा है।
यूँ तो खबर बासी है पर अब गूगल डॉक्स ४८ भाषाओं में उपलब्ध है, जिनमें हिन्दी के अलावा ८ भारतीय भाषाएँ, ओड़िया, बांग्ला, कन्नड़, गुजराती, तमिळ, तेलुगु, मराठी, मलयालम, में भी शामिल है। तो बताइए अपने मित्रों को, लाभ उठाएँ इस सुविधा का – यह है भी मुफ़्त।
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