मुख : हिन्दी : आलोक : नौ दो ग्यारह : ज़रूरत है ज़रूरत है

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24.5.04

ज़रूरत है ज़रूरत है

कुछ समय तक नौ दो ग्यारह रहने के बाद नया आतिथ्य चालू हो गया है। यदि आपको कोई दिक्कत आती है, स्थल को देखने में तो बताएँ। वैसे यह तो वही बात हुई न की जो लोग नहीं आए हैं वे अपने हाथ खड़े करें। खैर यह सूचना मैं अक्षरग्राम पर भी दे दूँगा। पङ्कज के खर्चे पर काफ़ी काम आसान हो गए हैं। यह बात अलग है कि आजकल नौ दो ग्यारह पर पढ़ने के लिए कुछ खास नहीं रहता है, पर सूचना देने में क्या हर्ज़ है। इस बीच बङ्गलोर में दोस्त लोग कह रहे हैं कि मैं उन्हें चिट्ठी नहीं लिख रहा हूँ। तो सोच रहा हूँ कि मनीला के हालचाल लिखने के लिए अलग चिट्ठा शुरू करूँ, वैसे यदि ब्लॉगर में वर्गीकरण की सुविधा हो तो मैं यहीं पर लिख सकता हूँ। हाँ, चिट्ठी से मेरा मतलब है विपत्र, कागज़ी चिट्ठी नहीं। इस बीच खेद है कि हिन्दीकरण वाले काम थम से गए हैं, या यूँ कहें कि काम तो चल रहे हैं पर वे नज़र नहीं आ रहे हैं (अपनी बात कर रहा हूँ, औरों की नहीं।) इस बात की ख़ुशी भी है कि डीमॉज़ पर एक और सम्पादक, अञ्जन भूषण अवतरित हुए हैं। आप भी चाहें तो सम्पादक बन सकते हैं - शीर्षक वाली कड़ी देखें। हाँ, सम्पादकों के अलावा स्थल बनाने वाले चाहिएँ, इसमें कोई शक नहीं। और सब ठीक ठाक, जय हो डॉक्टर साहब की।
16:00 बजे आलोक द्वारा।
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