विजय ठाकुर, यह हाथ मुझे दे दो। जो इतनी कविताएँ लिख डालते हैं। अपुन तो कविता के नाम से ही नौ दो ग्यारह होने लगते हैं। ईश्वर प्रदत्त कला है, क्या कर सकते हैं। पर देख रहा हूँ जाल पर कविताओं का भरमार हो रहा है।
इस बीच देखा कि हिन्दी के चिट्ठों की इतनी भरमार हो गई है कि आराम से पन्द्रह मिनट लगते हैं सबको दिन में एक बार देखने में। छः महीने पहले यह काम दो मिनट में हो जाता था। बढ़िया है। पता चला कि
तोता चश्म का मतलब क्या होता है,
फ़ुरसतिया जी की बदौलत। देखते हैं गूगल
तोता चश्म को कब तक पकड़ता है। अभी तक तो खाली लौट रहा है।
06:04 बजे आलोक द्वारा।
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पंकज