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26.7.05

खुल गया भेद

लेकिन उन दिनों इनकी ज़ुबान से हिंदी शायद ही कभी निकलती थी, अंग्रेज़ी मीडिया के पत्रकार थे और नामीगिरामी अंग्रेज़ी स्कूलों में शिक्षा पूरी की थी. वही पत्रकार धड़ल्ले से तो नहीं लेकिन अच्छी तरह समझ में आ जानेवाली हिंदी बोल रहे थे. मैने अपने एक पुराने संपादक से पूछा कि हिंदी अचानक इतनी फ़ैशनेबल कैसे हो गई.
क्यों? किसीने पन्द्रह साल पहले सोचा था कि ऐसा होगा? और यही हिन्दी के जालस्थलों के साथ भी होगा।
13:42 बजे आलोक द्वारा।
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2 छींटाकसी -
Blogger आशीष ने अर्ज़ किया है...
दिल तो चाहता है कि ऐसा ही हो।
Blogger अनुनाद सिंह ने अर्ज़ किया है...
मन खुश कर दिया इस समाचार ने और आपकी आशा ने ।

अनुनाद
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