पन्द्रह सितम्बर 2005 वाले पखवाड़े के अनुगूँज का विषय है
हिन्दी जाल जगत: आगे क्या?
इस पर पहले भी चर्चा हो चुकी है, लेकिन उसका उल्लेख करके आपको पूर्वाग्रहग्रस्त न करते हुए केवल एक तथ्य (तथ्य, राय नहीं) आपके सामने पेश करता हूँ।
हिन्दी के कुल जालस्थलों की सङ्ख्या इस वक़्त छः सौ से कुछ अधिक है। पर निश्चय ही सात सौ से कम है।
इनमें भी काम की चीज़ ढूँढने जाएँ तो रो पिट कर अन्य भाषाओं के स्थलों से काम चलाना पड़ता है।
अब इस तथ्य से सम्बन्धित अपनी राय दीजिए।
(1)
क्या यह स्थिति वाञ्छनीय है?
यदि हाँ, तो क्यों?
यदि नहीं तो क्यों नहीं?
(2)
इतना तो निश्चित है कि जाल पर हिन्दी बढ़ेगी।
पर क्या बढ़ने की रफ़्तार वही रहेगी जो अभी है?
या रफ़्तार कम होगी?
या रफ़्तार बढ़ेगी?
(3)
क्या हिन्दी जाल जगत को सर्वाङ्गीण विकास की आवश्यकता है? क्या विकास की दिशा का नियन्त्रण किया जाना चाहिए या इसे अपने आप फलने फूलने या ढलने देना चाहिए? साथ ही, वैयक्तिक रूप से क्या हम इस विकास पर कोई असर डाल सकते हैं?
ज़रूरी नहीं कि इन सभी पहलुओं पर आप लिखें, यह भी ज़रूरी नहीं कि आप इनमें से किसी भी पहलू पर लिखें। अनुगूँज की चेंपी लगी होगी तो आपके लेख को शामिल कर लिया जाएगा :)
अन्ततः यह अवसर देने के लिए धन्यवाद।
अनुगूँज है क्या?
अपने लेखों की कड़ियाँ टिप्पणियों में डालने का कष्ट करें। या फिर ट्रॅकबॅक कर दें (आज तक मुझे पता नहीं चला है कि यह करते कैसे हैं)। लेख के साथ अनुगूँज की छवि लगाना न भूलें।
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11:02 बजे आलोक द्वारा।
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