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6.9.05

हिन्दिका

हिन्दिका, व्यवसायिक यूनिकोडित हिन्दी स्थल बनाने की ओर अग्रसर एक प्रयोग है। जो सुविधाएँ अभी जाल पर हिन्दी में उपलब्ध नहीं है, और निःशुल्क रूप से नहीं प्रदान की जा सकती है, अथवा की जा सकती हैं पर उनमें प्रयास बहुत लगेगा, वे यहाँ आपको मिलेंगी। क्या देखना और करना चाहेंगे आप हिन्दिका पर?
  • मुम्बई से रतलाम की रेलवे समय सारिणी, आरक्षण के बारे में पता करना
  • आज पूना से भोपाल हवाई जहाज़ से जाने के लिए सबसे सस्ती टिकट के बारे में पता करना
  • दशहरे पर हिन्दी में ईकार्ड प्रेषण
  • डॉक्टर से स्वास्थ्य सम्बन्धी बातचीत व शङ्का समाधान
  • जालस्थल बनाने के लिए विस्तृत प्रशिक्षण सामग्री
  • कम्प्यूटर पर आम काम करने के बारे में सचित्र निर्देश
  • बङ्गलोर शहर के दर्शनीय स्थल, दाम, खरीदने के लिए चीज़ें
  • नौकरियों की अर्ज़ियाँ भरने की तारीखें
  • निबन्धों का सङ्ग्रह, टोपो मारने के लिए
  • प्रोग्रामिङ्ग भाषाओं के बारे में जानकारी व कुञ्जियाँ
  • और क्या? लिखिए टिप्पणियों में। टिप्पणी - निःशुल्क रूप से नहीं प्रदान की जा सकती है से अभिप्राय यह है कि किसी को पैसा खर्चना होगा, ज़रूरी नहीं कि स्थल के प्रयोक्ता को ही।
    16:28 बजे आलोक द्वारा।
    3 छींटाकसी
    इस लेख के हवाले
  • 3 छींटाकसी -
    Blogger Sunil Deepak ने अर्ज़ किया है...
    Dear Alok, this is a lunch time comment from my workplace, so no takhti here for writing in Hindi. In the present setup, I am not so sure about viability of commercial model for services in Hindi. All services you list can be accessed free in English, so you expect people to pay for them for their Hindi-prem? Or you expect enough number of persons, able to pay but who do not know English? May be a model based on advertisements be more logical? Sunil
    Blogger आलोक ने अर्ज़ किया है...
    so you expect people to pay for them for their Hindi-prem?

    जी नहीं। कतई नहीं।
    इरादा विज्ञापनों व प्रायोजकों के जरिए इन सुविधाओं को प्राप्त करवाना है।
    अन्ततः लक्ष्य यह है कि जो सुविधा अन्य भाषाओं में मिलती है, वही हिन्दी में मिले। सम्भव है कि कुछ सुविधाएँ प्रदान करते समय लाभ हो, और कुछ में न हो।
    मूलतः कार्यशैली वही होगी जैसी चिट्ठे लिखते समय होती है, बस थोड़ी और अनुशासित। हर चीज़ तो आप चिट्ठे के ज़रिए नहीं प्रदान कर सकते हैं।
    इस प्रयोग का अभिप्राय है यह पता लगाना कि क्या कोई हिन्दी का स्थल वित्तीय तौर पर अपने पैरों पर खड़ा हो सकता है? शायद हाँ, शायद नहीं, शायद हाँ, पर उस रूप में नहीं जैसा हम सोच रहे हैं, लेकिन जब तक करेंगे नहीं तब तक तो पता नहीं चलेगा।
    इतना निश्चित है कि आगन्तुक और सामग्री ही स्थल की जान हैं, भाषा कोई भी हो। अतः हम यही जानना चाहते हैं कि आप क्या सामग्री, किस रूप में चाहते हैं, बस ये मान के चलें(भले ही झूठ मूठ ही) कि धन व श्रम की कोई सीमा नहीं है।
    Blogger आलोक ने अर्ज़ किया है...
    May be a model based on advertisements be more logical?
    ऐसा ही कुछ विचार था। वैसे यदि धन न मिले पर हिन्दी में जाल पर सामग्री बढ़े और प्रयोक्ता बढ़ें तो भी हमारी जीत ही होगी। यदि धन मिला तो उत्साह रहेगा, अधिक खर्चीली सुविधाएँ प्रदान करने की ओर प्रयास करेंगे, यदि नहीं तो मूलभूत सुविधाएँ ही रहेंगी, ताकि खर्चा नियन्त्रण में रहे।
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