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5.10.05

अशोक का शोक

अशोक के शोक के बारे में पढ़िए। वैसे लोग इतनी कविता कैसे लिख मारते हैं। यह एक चीज़ है जिसमें मैंने कभी भी हाथ नहीं आजमाया। निबन्ध, कहानियाँ लिखने की तो प्रतियोगतिएँ होती थी, पर कविता की कभी नहीं। जो होती थीं, कविता घोटने की ही होती थीं। कितनी सारी घोटी थी - जल की रानी से ले के झाँसी की रानी तक। पर इतना तो कभी दिमाग़ में नहीं आया कि खुद की कविता लिखी जाए। इससे पता चलता है कि इंसान का व्यवहार उसके वातावरण द्वारा प्रेरित होता है। जो कविताएँ गढ़ने की क्लास हुआ करती तो हम भी चेंपते रोज दो चार दो चार। चेंपे रहो।
13:40 बजे आलोक द्वारा।
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1 छींटाकसी -
Blogger Debashish ने अर्ज़ किया है...
Is se bhi jyada hairat ki baat hai ki log Blog-city per blog kaise bana lete hain, aur aap unhe dhoond kaise lete hain ;)
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