अब बात चल ही पड़ी है तो अपने जालस्थल रूपी रेल के डब्बों पर दोनो तरफ़ हिन्दी के तमगे लगाने के बारे में भी कुछ।
अगर आपका कोई हिन्दी का जालस्थल नहीं है तो इस प्रविष्टि को नज़रन्दाज़ करें, अगली वाली का इन्तज़ार करें।
1. अपनी हटमल के <head> और </head> वाली चिप्पियों के बीच <meta http-equiv="Content-Type" content="text/html; charset=UTF-8"> चेंप दें। इससे प्लेटफ़ार्म पर मौजूद ब्राउज़रों और पटरी के उस पार मौजूद खोजी कुत्तों को यह पता चलता है कि आपका स्थल यूनिकोड में है।
2. अपनी हटमल के <head> और </head> के बीच <meta http-equiv="Content-Language" content="hi"> भी चेंपें। इससे पटरी की दूसरी तरफ़ मौजूद खोजी कुत्तों को पता चलता है कि आपकी सामग्री हिन्दी में है।
3. अपनी हटमल में हटमल चिप्पी की लैंग विशेषता में बताएँ कि आपके पन्ने की भाषा क्या है। <html lang="hi"> - वैसे <html> वाली चिप्पी तो आपके स्थल पर पहले ही होगी - वह तो आपकी रेल का इंजन है। अगर उसके आगे लैंग वाली विशेषता न दी हो तो उसे जोड़ दें।
4. अगर आप बीच में एकाध अनुच्छेद संस्कृत में चेंपते हैं तो खोजी कुत्तों को सूँघने के लिए कुछ और बू छोड़ें -
<html lang="hi">यहाँ पर कई <p> वाले डब्बे एक <html lang="hi"> वाले डब्बे के अन्दर हैं। पर किसी खास अन्दरूनी डब्बे की भाषा अलग हो तो केवल उसकी भाषा अलग से सुँघाई जा सकती है। इससे प्लेटफ़ॉर्म पर मौजूद यात्रियों - यानी ब्राउज़र में देखने वालों को कुछ खास फ़र्क नहीं पड़ेगा। सभी भाषाओं के कूट उपलब्ध हैं।
अगली बार प्लेटफ़ार्म पर मौजूद यात्रियों के लिए कुछ, क्योंकि वह भी स्टेशन मास्टर को अपने व्यवहार से कुछ बताते हैं।
और हाँ, हटमल किसी खटमल की प्रजाति नहीं है। इसका मतलब है ऍचटीऍमऍल। इस शब्द का ईजाद दिनेशराय जी ने किया है।
यह जानकारी अंग्रेज़ी में भी उपलब्ध है।
नौ दो ग्यारह होने से पहले -
अगर आप चिट्ठा स्वामी हैं तो पहली 3 चीज़ें आपको केवल एक बार अपने खाके में जा के करनी होंगी। चौथी चीज़ का हर प्रविष्टि में खयाल रखना होगा, उसमें भी यदि आप हटमल सम्पादन नहीं करते हैं तो नज़रन्दाज़ कर सकते हैं, क्योंकि "कंपोज़ मोड" में आपको हटमल नहीं दिखेगी।
अब हम होते हैं नौ दो ग्यारह।
09:20 बजे आलोक द्वारा।
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पिछली पोस्ट पढने के लिए कहाँ जाए, साइडबार मे पिछली पोस्ट के लिंक तो दे दो दादा।
मेरा इस तरह के अंग्रेजी शब्दों के बारे में सोच ही यह है कि या तो उन्हें ज्यों का त्यों हिन्दी में प्रयोग किया जाये या उन का थोड़ा बहुत हेरफेर करके हिन्दीकरण कर लें जिस से पहली बार पढ़ने पर मामूली अनुमान से उसका अर्थ समझ आ जाए। इस तरह हम विदेशी शब्दों के भारी भरकम जीभ और कलम की कसरत कराने वाले अप्रचलित शब्दों से बचेंगे और आसानी रहेगी। वैसे भी आसान शब्दों का प्रयोग जल्दी ही आम हो जाता है। मुझे लगता है, हटमल शब्द का प्रयोग सफल रहा। इसे क्यों न हिन्दी शब्दकोष में स्थान मिले?