टाटा इंडिकॉम का प्लग टु सर्फ़ ले तो लिया – लेना ही पड़ा, मजबूरी जो थी। लेकिन बिल बड़ा ज़बर्दस्त आया।
बीस दिन के अन्दर १९०० रुपए(जी हाँ, उन्नीस सौ रुपए) का ठुच्चा लग गया। यह पता भी तब चला जब उन्होंने फ़ोन किया कि आपका फ़ोन बंद कर दिया गया है, पहले पैसे जमा कराओ।
चुनाँचे, मरता क्या न करता, कल उनके दफ़्तर में पैसे जमा कराने गया। ऑफ़िस तो चकाचक, एसी वाला था। वहाँ पर मौजूद महोदय ने सोलह सौ रुपए भरवाए(चार सौ पिछत्तर रुपए की रियायत है हर महीने, छः महीने तक), और फिर कहा कि आपका काम फिर चालू है। मैंने पूछा कि भइया हर महीने तीन हज़ार की चपत लगाओगे क्या? उसने कहा कि आप पीछे वाली देवी जी से बात करके दूसरी स्कीम ले लें, वह मैंने ले ली।
इस स्कीम में ९०० रुपए में डेढ़ जीबी का इस्तेमाल किया जा सकता है, महीने के अन्दर। उम्मीद है कि अब तो नौ सौ से ज़्यादा का बिल नहीं आएगा, और आ गया तो मुझे शक होगा कि कहीं घपला तो नहीं है। क्योंकि डेढ़ जीबी महीने भर में निपटाना बहुत मुश्किल है। पर अगले महीने बलि का बकरा बन के ही जाँचा जा सकता है, और कोई तरीका तो है नहीं।
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बाकी की खबर में यही है कि काठ की हाँडी बार बार नहीं चढ़ती है। इस बार कतई नहीं चढ़ी। बहुत खुशी हुई। पुराने दोस्त कहते हैं कि हम तो पक गए, अब लिखने का मन ही नहीं करता। मैं यही कहता हूँ कि उँगली को काटने के बजाय बड़ी उँगली आगे लाओ, दूसरी अपने आप छोटी हो जाएगी – बीरबल शैली में, लेकिन कभी हुआ ही नहीं ऐसा। उम्मीद है कि लोगबाग नींद से जागेंगे, और उँगली को बड़ा करेंगे, और हाहाहीहीहोहो को उतनी ही तवज्जो देंगे जितनी देनी चाहिए, इसमें समय नष्ट करने के बजाय हम लोग लाइव्जर्नल का हिन्दी अनुवाद करेंगे, वर्ड्प्रेस के नए उद्धरण को हिन्दी में ले के आएँगे, नए दक्ष लोगों को हिन्दी में लिखने के लिए प्रेरित करेंगे, नए औज़ार बनाने के लिए प्रेरित करेंगे, गूगल के अनुवाद की त्रुटियाँ ठीक कराएँगे और ऐडसेंस के विज्ञापनों से कमाई और अपने चिट्ठों की हिट्स की चिन्ता करना बन्द करेंगे। हममें से कई ने इतिहास बनाया है, उम्मीद है कि वह हड़प्पा और मोहनजोदड़ो बन कर न रह जाएगा, तक्षशिला और नालन्दा के गीत बनकर न रह जाएगा। उम्मीद है कि हम यह एहसास करेंगे कि चिट्ठों के बाहर भी अन्तर्जाल की बहुत बड़ी दुनिया है, जो कि साढ़े सत्ताईस चिट्ठों से बड़ी है। इतनी बड़ी है कि हमारी सङ्ख्या बढ़ने से यह अपने आप वायु की तरह और फैलती जाएगी, बिना अपना घनत्व और गांभीर्य खोए हुए।
मर्फ़ी का नियम – अन्तर्जाल प्रयोक्ताओं के अनुपात में बढ़ता रहता है।
इस बस में सबके लिए जगह है। अब हम होते हैं नौ दो ग्यारह। इंडिकॉम का बिल जो बढ़ रहा है।
Jagdish Bhatia ने अर्ज़ किया है...
Gyandutt Pandey ने अर्ज़ किया है...
आलोक ने अर्ज़ किया है...
Raviratlami ने अर्ज़ किया है...
amit gupta ने अर्ज़ किया है...
आलोक ने अर्ज़ किया है...
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