बिल्लू भाई तमिळ सीख चुके हैं! यह जालनाद अंग्रेज़ी और तमिळ दोनो में है। ज़्यादा नहीं आती है और इस पर काम भी नहीं करता हूँ पर कोशिश रहेगी कि इसे देख/सुन सकूँ। २२ जून २००९ को चार बजे शाम को।
अपने तमिळ भाइयों और उनकी भाभियों को बताना न भूलिएगा
धत्तेरेकी! साले ब्लॉगर.कॉम का हरकारा ऐन वक़्त पर नौ दो ग्यारह हो गया, इसे सही समय पर छापा ही नहीं। भाइयों और भाभियों को माफ़ी। अब खुद छाप रहा हूँ, पर उम्मीद है कि ऐसे मौके और भी आते रहेंगे।
Labels: तकनीक
20:30 बजे आलोक द्वारा।आज एक लेख पढ़ा जिससे लगा कि रोना धोना क्या हर भारतीय का कर्तव्य है? भाषाविद् महेंद्र जी का लेख इतना निराशावादी है कि लगता है भारत के तथाकथित अभिजात्य वर्ग ने यह युद्ध शुरू होने के पहले ही हार मान ली है। इस लेख में मुख्यतः तीन बातें कही गई हैं
यह मानी हुई बात है कि अंग्रेज़ी में जाल पर सामग्री काफ़ी है, हिन्दी के मुकाबले। सो तो हैं, लेकिन इतना ही नहीं, किसी भी और भाषा के मुकाबले अंग्रेज़ी में जाल पर सामग्री काफ़ी ज़्यादा है। यहाँ बात अंग्रेज़ी बनाम हिन्दी की नहीं है, बल्कि अंतर्जाल में भाषाओं की विविधता की है। इसका कारण साफ़ है, क्योंकि अंतर्जाल पर किसी भी भाषा में सामग्री तैयार करने से किसी ने किसी को रोका नहीं है। सवाल यह है कि क्या आप अपने सामर्थ्य के अनुसार सामग्री पैदा कर रहे हैं? बगैर रोना धोना मचाए? अगर नहीं कर रहे हैं तो समस्या आपके साथ है, अंतर्जाल सबको बराबर मौका देता है।
लेखक कहते हैं कि उनकी पोती को हिंदी पढ़नी नहीं आती है। इसमें अंतर्जाल का कुछ दोष है क्या? केवल एक व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर यह कह देना कि देवनागरी लिपि मर रही है, क्या उचित है? मुझे तो नहीं लगता, मैं कई लोगों को जानता हूँ जो अमरीका में ही पैदा हुए हैं पर बहुत अच्छी देवनागरी पढ़ लिख लेते हैं, क्योंकि उन्हें वहाँ भी ऐसा माहौल और माता पिता मिले। लेखक जिस नई पीढ़ी की बात कर रहे हैं, वह बस बड़े शहरों और मध्यम शहरों में अंग्रेज़ी भाषाई शालाओं में पढ़ने वालों की बात है या विदेश में रहने वाले भारतीयों की बात है। यह वह लोग हैं जिन्हें वैसे ही अंग्रेज़ी में काफ़ी महारत हासिल है। लेकिन हिंदी के प्रयोक्ता केवल उन्ही तक सीमित नहीं है। यह बात समझना बहुत ज़रूरी है।
तकनीकी समस्या हिंदी लिखने पढ़ने की - दिन प्रति दिन कम होती जा रही है। हाँ इतना मानता हूँ कि पाठशालाओं में देवनागरी टंकन - इंस्क्रिप्ट पढ़ाया जाए तो एक पूरी पीढ़ी तर सकती है। पाठशाला वालने न पढ़ाएँ तो आप घर पर पढ़ाएँ। आपको कोई रोक नहीं रहा है।
नौ दो ग्यारह होने से पहले यही कहना चाहता हूँ कि चाहें जितना भी भाषण दे लो, घड़ा बूँद बूँद से ही भरता है। बूँदें चाहिए। भाषण और रोना धोना नहीं।
Labels: समाज
12:25 बजे आलोक द्वारा।ट्विटर के जरिए पता चला @khabar24 - खबर चौबीसी के बारे में।
कह रहे हैं कि हमारे रिपोर्टर बन जाएँ।, मालिक हैं नेक्स्ट जेन टेक्नोराइट। आपको और कुछ पता हो तो बताएँ।
आप पढ़िए खबर चौबीसा, हम होते हैं नौ दो ग्यारह।
Labels: समाचार
05:11 बजे आलोक द्वारा।यूँ तो आईसीआईसीआई से लगभग रोज ही एक चिट्ठी आ जाती है जिसे में तुरंत एक चटके में रद्दी की टोकरी में डाल देता हूँ, पर आज कुछ अलग ही था।
सुप्रभात - हिंदी में! चेतावनी - पीडीऍफ़ है।
अगर आप चाहें तो उन्हें धन्यवाद देने के लिए और प्रोत्साहित करने के लिए रिसर्च ऍट आईसीआईसीआईडायरेक्ट डॉट कॉम पर लिख सकते हैं।
Labels: व्यापार
17:11 बजे आलोक द्वारा।सिल्पा यानी संतोष तोट्टिङ्गल की स्वतंत्र इंडियन लैंग्वेज प्रोसेसिंग ऍप्लिकेशंस। बड़ा सोच समझ के सिल्पा नाम रखा है!
सारा माल पाइथन में हैं - साँप नहीं प्रोग्रामिंग भाषा पाइथन में। कोई नहीं, अपने को भी नहीं आती, पर आप और मैं यहाँ पर इसका परीक्षण कर सकते हैं जैसे कि क्रमांकन, लिप्यंतरण, भाषा अनुमानक और न जाने क्या क्या।
और अगर कुछ सही न चलता दिखे तो नौ दो ग्यारह होने से पहले संतोष को डाक भेज दें। यही तो मकसद था बताने का! http://smc.org.in/silpa
Labels: तकनीक
17:11 बजे आलोक द्वारा।बीमा संबंधी एक लेख तो यहाँ दिखा, बाकी के लिए सत्रारंभ करने को कह रहा है।
अच्छा प्रयास। जानकारी देने के लिए अनुनाद जी को धन्यवाद।
व्यापार संबंधी अन्य चिट्ठे और स्थल
Labels: व्यापार
05:11 बजे आलोक द्वारा।Labels: तकनीक
05:11 बजे आलोक द्वारा।
© Alok Kumar alok at devanaagarii dot net, 2002-2009, सीऍसऍस © डब्ल्यू ३ सी .