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Can't see Hindi?

Why can't I see the Hindi section?

5.12.07

हिन्दी वेबसाइट

जी हाँ, स्थल का नाम है हिन्दी वेबसाइट। यहाँ लिखा भारतेंदु हरिश्चन्द्र जी का दोहा - या चौपाई, या सवैया या कवित्त ? मुझे फ़र्क नहीं पता - पसन्द आया -
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल। अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।
दिलचस्प बात यह है कि यहाँ एचटीएमएल और पेजमेकर सीखने के लेख भी हैं, ऐडसेंस का बेहिचक इस्तेमाल है, और एक दिलचस्प चिट्ठा भी है। बढ़िया काम है जी के ए जी। शायद वनस्पति आधारित चिकित्सा का भी एक विभाग बनाया जा सकता है।

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10:30 बजे आलोक द्वारा।
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17.11.07

गुरुजी पर गुरुजी खोजिए + ब्लॉगर से हिंदी गायब

गुरुजी का हिंदी जालस्थल तो शायद पहले से ही था पर मैंने आज ही देखा। खोज करने पर पहला पन्ना काफ़ी धीरे आया पर परिणाम अच्छे हैं। अधिकतर भारतीय स्थल, जैसा कि गुरुजी कहते हैं। और मज़ेदार बात थी कि इनकी हिंदी काफ़ी अच्छी है, अनूदित सी नहीं लगती। इस बीच ब्लॉगर से हिंदी का विकल्प ही नौ दो ग्यारह हो गया है ऐसा लगता है। जब तक वापस नहीं आता है तब तक जापानी ही झेलो। ब्लॉगर-हिंदी-में-नहीं मतलब, ब्लॉगर का स्थल तो हिंदी में है, पर ब्लॉग्स्पॉट पर प्रकाशन का हिंदी वाला विकल्प ही गायब है। ब्लॉगर-हिंदी-में-पर ब्लॉग्स्पॉट नहीं शायद इस त्रुटि को ठीक कर रहे हों, कुछ समय बाद फिर वापस आजाए।

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10:59 बजे आलोक द्वारा।
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16.11.07

एक जापानी की यूनिकोड तालिका

जापानी और जापानियों की चर्चा हो ही रही है तो एक जापानी, रिचर्ड इशिदा - की बनाई इस तालिका को ही देख लें। अगर कहीं खाली डब्बे दिख रहे हों तो - "Show as graphics" पर सही का निशान लगाने पर ही सारे अक्षर दिखेंगे। अब इसमें 97D पर जो हँसिया बना है, वह क्या अक्षर है, समझ नहीं आया। उसके ऊपर नीचे के दो दो अक्षर तो शायद सिंधी और कश्मीरी में काम आते हैं। हाँ, वैदिक संस्कृत में स्वर/लय के लिए व्यंजन के ऊपर का खड़ा डंडा और व्यंजन के नीचे लेटा डंडा कहीं नहीं दिख रहा तालिका में, शायद यह इससे संबंधित हो? इस वाली तालिका में देखने से पता चला कि इसका नाम DEVANAGARI LETTER GLOTTAL STOP है। बस स्टॉप तो सुना था, पर ग्लोट्टल स्टॉप क्या है, शायद हरिराम जी बता पाएँ। हम होते हैं नौ दो ग्यारह, सायोनारा।

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18:08 बजे आलोक द्वारा।
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15.11.07

आगे बिल्लू, पीछे सेब

खबर यह है कि बिल्लू सेब को नहीं खा रहा, बल्कि सेब आगे दौड़ रहा है और बिल्लू पीछे। जापान में पिछले महीने, यानी अक्तूबर २००७ में ५४% सेब बिके हैं। यानी नए कंप्यूटर खरीदने वाले आधे से ज़्यादा वहाँ सेब खा रहे हैं। इससे कई बाते सामने आईं -
  1. जापानियों के पास बहुत पैसा है।
  2. जापानी लोग ओम शांति ओम, साँवरिया जैसी सड़ी फ़िल्मों के बजाय वास्तव में कलात्मक चीज़ें पसंद करते हैं
  3. यह खबर सुन कर ब्लॉगर इतना खुश हुआ कि हिंदी की तारीखें भूल गया। ब्लॉगर-हिंदी-त्रुटि बदल कर जापानी करनी पड़ी, सेटिंग्स -> प्रारूपण में जा कर। ब्लॉगर-जापानी
पर लाख बात की एक बात। बिल्ली से तेज़ तो तेंदुआ ही भागेगा न। तभी तो अक्तूबर में बिके कुल कंप्यूटरों में से १०० में ५४ तेंदुए ही बिके जापान में, मत्सु जी आजकल नौ दो ग्यारह हैं पर बिल्लू को पीटने पर उनको बधाई।

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18:43 बजे आलोक द्वारा।
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12.11.07

इण्डलिनक्स वालों की गपशप १३ नवंबर २००७ को

यह गपशप irc.freenode.net पर होगी, #indlinux पर। चर्चा के विषय वही होंगे जो आमतौर पर इण्डलिनक्स में होती है, बस डाक के बजाय थोड़ी और तुरत फुरत। यदि आपको यह न पता हो कि आईआरसी क्या होता है, तो यह ऍचटीटीपी या ऍफ़टीपी की तरह का ही एक और शगूफ़ा है। बंगलोर में पहली बार देखा था - कई साइबर कैफ़ों में रहता था। आजकल नौ दो ग्यारह हो चला है। आईआरसी के यूआरएल भी होता हैं, जो कि irc:// से शुरू होते हैं। जैसे ऍचटीटीपी मूलतः ८० का इस्तेमाल करता है, वैसे ही आईआरसी ६६६७ का इस्तेमाल करता है। और हाँ, इसमें से अधिकतर जानकारी यह लेख लिखने के पहले मुझे भी नहीं थी। विंडोज़ के जरिए शामिल होना चाहें तो ऍमआईआरसी का इस्तेमाल करें, लिनक्स के जरिए शामिल होना चाहें तो ऍक्स-चैट का इस्तेमाल करें, और सेब के जरिए, पता नहीं, कभी आजमाया नहीं। कल आजमाता हूँ। तो मिलते हैं, irc://irc.freenode.net#indlinux पर, रात नौ से ग्यारह हिंदुस्तानी समयानुसार।

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16:38 बजे आलोक द्वारा।
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7.11.07

टिप्पणियाँ नहीं दिख रही हैं

इस चिट्ठे पर ताज़ी टिप्पणियाँ नहीं दिख रही हैं, पर वह मौजूद हैं, नौ दो ग्यारह नहीं हुई हैं। यदि किसी को ऐसी समस्या आई हो तो बताएँ समाधान क्या हो सकता है। टिप्पणियों की मध्यस्थता लागू नहीं है। आप जवाब टिप्पणी से दे सकते हैं, यहाँ नहीं दिखेंगी पर मुझे डाक से तो मिल ही जाएँगी। शुक्रिया :)।

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09:30 बजे आलोक द्वारा।
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6.11.07

नोट का ब्लॉग और माले

हिंदी वाले ब्लॉगर को आपने देखा होगा तो नोट का ब्लॉग और माले के बारे में तो जानते ही होंगे। पर अगर नहीं, तो जान जाइए अब। ये है नोट का ब्लॉग। ब्लॉगर नोट का ब्लॉग यानी ब्लॉग्स ऑफ़ नोट। करारे नोटों वाले नहीं, वरन उल्लेखनीय चिट्ठे :) और यह लिंग माले में है - वह भी बिना वीज़ा के। ब्लॉगर माले गूगल भइया को इसके बारे में संदेश लिख दिया है। देखते हैं कितनी जल्दी ठीक होता है।

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08:20 बजे आलोक द्वारा।
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2.11.07

हिंदी जाल जगत, २००२ में, और आज पाँच साल बाद

सन २००५ में ली गई यह छवि, लिनक्स शब्द की खोज के ५८१ परिणाम दिखाती है। गूगल से लिनक्स के परिणाम और अब अगर यही खोज करेंगे, तो आते हैं लिनक्स के १२,२०० परिणाम। यानी दो साल में २१ गुना बढ़ोतरी। उसी तरह, नौ दो ग्यारह की खोज करने पर आज २०,२०० परिणाम मिले। २००२ या २००३ में २५ परिणाम मिले थे। गूगल से नौ दो ग्यारह के परिणाम पाँच साल के अंदर २५ और २०,००० में तो पूरे ८०८ गुना का फ़र्क है। है न दिलचस्प बढ़ोतरी हिंदी के स्थलों की? या हो सकता है गूगल ने अपनी खोज सुधार ली हो :) शायद दोनो ही हुए हैं। वैसे उन दिनों हिंदी खोज के लिए क्या शब्द डालें ताकि गूगल खाली हाथ न लौटे, यही सोचने में दिन के एक दो घंटे जाते थे। तारीखें ठीक करवाने के लिए अमित जी का शुक्रिया। कोई और त्रुटि हो तो बताएँ, आपका आभारी होऊँगा।

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08:19 बजे आलोक द्वारा।
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1.11.07

दावा

Review My Blog at HindiBlogs.org बस यही नहीं समझ आता कि अपनी ही चीज़ के लिए बार बार दावा क्यों ठोंकना पड़ता है। वैसे हिंदी ब्लॉग्स की शक्लोसूरत इतनी बढ़िया है कि नौ दो ग्यारह होने का मन ही नहीं करता। मैं वहाँ कम से कम २० मिनट तो बिता ही चुका हूँ। बस ऊपर तस्वीर में जो लिखा है वह हिंदी में होता तो मज़ा आ जाता।

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20:21 बजे आलोक द्वारा।
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30.10.07

ब्लॉगवाणी के चरित्र पर कुछ गंभीर बातें

यहाँ पर मैं सिलसिलेवार, पिछले कुछ दिनों में हुई घटनाओं के बारे में कुछ बताना चाहता हूँ। पूरी बात शुरू से बता रहा हूँ क्योंकि यह सार्वजनिक महत्व का विषय है। सार्वजनिक महत्व का विषय क्यों है, वह भी बताऊँगा। १. चिट्ठाजगत-संकलक की एक नई सुविधा के ऊपर एक लेख छपा। २. उस पर कुछ टिप्पणियाँ हुईं, वह भी ऐसे व्यक्तियों द्वारा, जो पहले कभी इस तरह की चर्चाओं में शामिल होते दिखे भी नहीं थे। आखिर १००० चिट्टे होने के बाद भी चिट्ठाजगत अभी बहुत बड़ा तो नहीं है। आश्चर्य हुआ कि यह सब लोग कौन हैं, और सभी एक ही राग कैसे अलाप रहे हैं। वह भी बहुत कम अंतराल में ही एक के बाद एक टिप्पणियाँ, और सब में वही मत। कुछ शक हुआ, सभी एक ही व्यक्ति तो नहीं हैं? ३. इस घटनाक्रम के ऊपर इस चिट्ठे पर एक प्रविष्टि लिखी। ४. कुछ दिन पहले मेरा यह ९ २ ११ वाला चिट्ठा ब्लॉगवाणी पर दिखना बंद हो गया। घटनाक्रम पर प्रविष्टि इसी चिट्ठे पर लिखी गई थी। ५. मैंने कुछ मित्रों से पूछा, कि क्या हो सकता है, कि यह चिट्ठा ब्लॉगवाणी पर दिखना बंद हो गया, क्या उनके साथ भी यही समस्या आई है, सुझाव दिया गया कि लिख के पूछ लें। ६. उन्हें डाक लिखी। लिखा, कि मेरा चिट्ठा दिखना बंद हो गया है। कृपया बताएँ कि ऐसा क्यों है। ताकि शायद यदि कोई तकनीकी खराबी की वजह से ऐसा है तो ठीक हो जाए। उनके स्थल पर डाक पता था, सो लिखा। ७. कोई जवाब नहीं आया। ८. इस बीच कुछ लोगों ने इस बारे में प्रविष्टियाँ लिखीं। कुछ ने तटस्थ भाव से लिखीं, कुछ ने कोक-पेप्सी की तुच्छ लड़ाई के रूप में। कुछ ने ब्लॉगवाणी से जवाबदेही की माँग की। ९. फलस्वरूप, अभिनव (वही टिप्पणियाँ करने वाले) ने अपने चिट्ठे पर लेख छापा जिसमें यह लिखा था कि अभिनव ब्लॉगवाणी के संचालकों के परिवार के सदस्य हैं। पहली बार यह बात सार्वजनिक हुई। ब्लॉगवाणी पर या अभिनव जी के चिट्ठे पर इसका कोई उल्लेख इसके पहले नहीं था। १०. इस बीच दो अन्य चिट्ठाकारों से फ़ोन पर बात हुई और उन्होंने कहा कि वे पता लगाते हैं कि हुआ क्या है। पता लगाया गया, और जवाब यह मिला कि चिट्ठाजगत से उनके परिवार के सदस्यों के चिट्ठे हटाए जाने की वजह से ऐसा हुआ है। और इस लेख से इस बात की भी पुष्टि हो गई कि यह तकनीकी खराबी की वजह से नहीं हटा है, बल्कि जानबूझ कर हटाया गया है। फिर कुछ लोगों ने बातचीत की, एक बार फिर उल्लेख हुआ कि चिट्ठाजगत-संकलक से ब्लॉगवाणी के संचालकों के परिवार के सदस्यों के चिट्ठे हटाए गए हैं, बहरहाल मेरा चिट्ठा वापस शामिल भी कर लिया गया। पूछा कि ये परिवार के सदस्य कौन हैं। पता चला कि {नूर मोहम्मद खान बनाम मैथिली गुप्त बनाम धुरविरोधी}, अभिनव, और सिरिल मैथिली गुप्त एक ही परिवार के सदस्य हैं और तीनो ब्लॉगवाणी से संबद्ध हैं। साथ ही अरुन अरोरा नामक एक सज्जन भी ब्लॉगवाणी से संबद्ध हैं। इनमें से कौन ब्लॉगवाणी का वास्तविक संचालक है, और किनकी क्या क्या ज़िम्मेदारियाँ हैं, यह मुझे ज्ञात नहीं। नूर मोहम्मद खान, अभिनव, और सिरिल - ये तीन नाम सामने रख दिए जाएँ, तो क्या पता चलेगा कि ये तीनो एक ही परिवार के सदस्य हैं? न तो इनके चिट्ठों पर ऐसा कहीं लिखा है न कहीं और। अच्छा हुआ जो इस घटना क्रम से यह पता चल गया। यह सब तो थे तथ्य। अब नीचे मेरी राय है और कुछ सवाल भी। कल अरुण अरोरा जी की, जो ब्लॉगवाणी के संचालक दल में हैं, की यह टिप्पणी आई। तो लगा, यह क्या है? मेरे मन में अब कई सवाल उठ रहे हैं। यदि चिट्ठाजगत के रोमनीकरण पर ब्लॉगवाणी के संचालकों को विरोध था तो उन्होंने अपने नाम से विचार क्यों व्यक्त नहीं किए? कई छद्म नामों से क्यों ऐसा किया? यह अनैतिक है। क्या उन्हें इसके लिए क्षमा नहीं माँगनी चाहिए, क्या यह वादा नहीं करना चाहिए कि ऐसा वे पुनः नहीं करेंगे? पर अगर वादा किया भी तो क्या गारंटी है कि ऐसा फिर से नहीं होगा। मेरा चिट्ठा हटाने के लिए "पारिवारिक चिट्ठों" का हटाना क्या एक बहाना ही नहीं था? जब उस समय किसी को पता ही नहीं था कि अभिनव ब्लॉगवाणी संचालक दल में है तो यह आरोप कैसे लगाया जा सकता है? यह आरोप ही झूठा है, और केवल नौ दो ग्यारह को नौ दो ग्यारह करने का एक बहाना था। ३. इस टिप्पणी के आने का मतलब क्या है? यही न, कि इस प्रकार की कारस्तानियाँ चलती रहेंगी। इस टिप्पणी में एक अनैतिक बात है किसी निजी डाक को सार्वजनिक करने की धमकी। वह कर दें, मुझे आपत्ति नहीं है। पर यह अनैतिक है। मैं कभी ऐसा नहीं करूँगा चाहे निजी डाक में सिर्फ़ हाल चाल ही पूछा गया हो, और जो व्यक्ति डंके की चोट पर ऐसा करने की धमकी देता है, उसकी नैतिकता स्पष्ट है, मैं उससे कोई संबंध नहीं रखना चाहता। पर यह भी देखा कि इस टिप्पणी के विरोध में किसी ने कुछ कहा भी नहीं है। सब खुश हैं कि चिट्ठा जुड़ गया है। इस टिप्पणी पर ब्लॉगवाणी के संचालक ने आपत्ति क्यों नहीं की? क्या ब्लॉगवाणी के संचालक को मालूम है कि यह टिप्पणी की गई? या उन्हें मालूम था, पर उन्होंने कुछ कहना या करना ज़रूरी नहीं समझा? हिंदी जाल जगत के बाशिंदे क्या अब इस प्रकार के व्यवहार के आदी हो चुके हैं? क्या हम सबको यह सहज व स्वाभाविक लगता है? क्या ऐसे व्यक्ति का सामाजिक बहिष्कार नहीं होना चाहिए? जो संस्था ऐसे व्यक्ति को पाल रही है क्या उसका सामाजिक बहिष्कार नहीं होना चाहिए? मुद्दा कभी चिट्ठा जुड़ने का था ही नहीं। मेरा तो केवल प्रश्न था कि चिट्ठा नहीं दिख रहा है, कारण क्या है। जुड़ना, न जुड़ना तो बाद की बात थी। यह स्पष्ट हो गया है कि चिट्ठा जानबूझ के हटाया गया है, किसी तकनीकी खराबी की वजह से नहीं, न ही आपत्तिजनक सामग्री की वजह से। अब ब्लॉगवाणी से हट के कुछ और सार्वजनिक हित की बातें करते हैं। इस पूरे प्रकरण में मुझे कुछ और जानकारियाँ मिली हैं जो आपके काम की हो सकती हैं। उनको मद्देनज़र रखते हुए आप से सार्वजनिक रूप से यह अनुरोध है। १. यदि आपको कोई नकली पहचान मिलती हैं, तो सावाधान रहें, और ऐसी जानकारी को सार्वजनिक करें। २. यदि आपको कोई प्रायोजित चिट्ठे मिलते हैं तो सावधान रहें और ऐसी जानकारी सार्वजनिक करें। ३. यदि आपको पता चलता है कि आपके नाम से फ़र्ज़ी डाक भेजी गई है तो घटना को सार्वजनिक करें। यह दंडनीय अपराध है। कृपया ऐसी परंपरा का प्रारंभ न करें कि किसी के नाम से फ़र्ज़ी डाक पाना रोज की बात हो। फ़र्ज़ी डाक का स्रोत पता लगाना मुश्किल नहीं है। ऐसी कोई भी घटना पुनः होती है तो आप मुझे बताएँ। यदि आप सार्वजनिक न करना चाहें तो मैं करूँगा। ४. किसी अन्य चिट्ठाकार की बुराई करने के लिए लिखने का अनुरोध पाने पर उसे अस्वीकार करें, चाहे कितने पैसे दिए जा रहे हों। साथ ही इसे सामने लाएँ, सार्वजनिक करें। ऐसे कामों के लिए कभी पैसे न लें न कोई सहायता लें। यह केवल वातावरण दूषित करता है। ५. किसी के भड़काने में न आएँ। तथ्यों की खुद खोजबीन करें। यदि फिर भी शक हो तो थोड़ा ठहरें, हवा साफ़ होने दें। "भेड़िया आया" के पहचानें और फिर उन्हें नज़रंदाज़ करें। चलिए अब वापस ब्लॉगवाणी पर आते हैं। जिस स्थल की चिट्ठे शामिल करने और निकालने का कोई हिसाब ही न हो, और जो इस प्रकार की दूषित नीतियाँ अपनाता है, क्या उसपर भरोसा करेंगे? क्या आप उसको मान देंगे? सिर्फ़ इसलिए कि वह हिंदी में है? ध्यान दें, यह आक्षेप स्थल की नीतियों पर है, व्यक्तिगत नहीं है। स्थल की सामग्री के आधार पर या चिट्ठे के स्वामी के आधार पर जब चिट्ठों को हटाया जा रहा है, तो क्या आपको स्वीकार्य है? चिट्ठे की सामग्री में कोई समस्या नहीं है। क्या ऐसा ही हो आपका संकलक? क्या आपको लगता है कि यह छोटा सा मामला है? मुझे नहीं लगता, क्योंकि मैं चरित्र को महत्व देता हूँ। मेरे लिए हिट्स पाना ज़रूरी है, लेकिन वह तो मैं अंग्रेज़ी लिख के भी पा सकता हूँ। अब तक मैं यह मान के चल रहा था कि यदि कोई हिंदी में अंतर्जाल पर कुछ शुरू करता है तो वह सुचरित्र ही होगा। पर पता चल गया कि ऐसा नहीं है। मैं यदि किसी स्थल या परियोजना से जुड़ूँगा तो इस प्रकार की आचार संहिता के अधीन ही। अब तक यह मौखिक थी, अब लिख दी है ताकि किसी को शंका न रहे। मेरी कोई आर्थिक मजबूरियाँ नहीं जिनके चलते मुझे अपना आचार बदलना पड़े। अतः मैं ब्लॉगवाणी का बहिष्कार कर रहा हूँ। कोई अकेला खुराफ़ाती होता तो बात अलग थी, मैं नज़रंदाज़ ही करता, पर यह संस्थागत है। उनकी इच्छा है, मेरा चिट्ठा रखें या न रखें। मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। न रखें तो शायद उनके लिए बेहतर होगा, क्योंकि मैं अनैतिक चीज़ों का खुलासा यहाँ करता ही रहूँगा। मुझे पता है कि यदि ब्लॉगवाणी से संबंध रहे तो ऐसे प्रकरण दुबारा होंगे, क्योंकि यह दोष संचालन का है। या तो मुख्य संचालक को पता ही नहीं है कि चल क्या रहा है, या सब संचालक की जानकारी में रहते हुए हो रहा है। मुझे ऐसे स्थल पर आस्था नहीं है। मुझे नहीं लगता कि वह मेरे लिए उपयोगी होगा। इतना ही नहीं मुझे तो लगता है कि इससे हिंदी जाल जगत को बहुत बड़ा नुकसान होगा। हाँ. यदि मेरे ब्लॉगवाणी के साथ कोई आर्थिक संबंध होते या वित्तीय रूप से उनपर आश्रय होता तो यह ज़िल्लत ज़रूर झेलता। पर मुझे यह करने की कोई ज़रूरत नहीं है। हम जितना झेलेंगे, उतना ही ये झिलाएँगे। हम क्यों झेलें? क्या आप घर और काम से समय निकाल कर इसलिए अंतर्जाल पर आते हैं कि ज़लील किए जाएँ? क्यों अपनाऊँ इन्हें मैं? सिर्फ़ इसलिए कि वे हिंदी में लिखते हैं? नहीं, यह मेरे लिए काफ़ी नहीं है। साथ ही कुछ और अनुरोध। १. यदि आपको मेरे नाम से कोई डाक मिले तो उसका उत्तर दे कर पहले पुष्टि कर लें कि क्या वह वास्तव में मैंने भेजी है या नहीं। यदि आपको मेरे नाम से डाक मिलती है तो कृपया मूल रूप मुझे भेजें। मैं प्रेषक के खिलाफ़ क़ानूनी कार्यवाही करूँगा। २. मैं इस प्रकरण में और आगे भी कभी किसी फ़र्ज़ी पहचान या बेनामी पहचान से कोई टिप्पणी नहीं करूँगा। यदि आपको मेरे नाम की कोई टिप्पणी मिलती है और वह भड़काऊ है तो एक बार मुझसे पुष्टि कर लें कि क्या वास्तव में वह मैंने ही लिखी है क्या। ३. मैं किसी भी व्यक्ति पर व्यक्तिगत आक्षेप नहीं करूँगा और न ही किसी व्यक्तिगत आक्षेप का जवाब दूँगा, क्योंकि इससे मुख्य गंभीर मुद्दे पर रायता फैलता है, इसलिए नहीं कि मैं जवाब दे नहीं सकता। मैं भी पंजाब में रहता हूँ, गालियाँ तो मुझे भी आती हैं। उपरोक्त सभी आक्षेप ब्लॉगवाणी के संचालन प्रणाली पर हैं, किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं। कृपया टिप्पणी करें तो ब्लॉगवाणी की संचालन प्रणाली पर करें, व्यक्तियों पर नहीं। तो आप सोच लें, क्या आप किसी भी जालस्थल के अनैतिक व्यवहार - को बढ़ावा देना चाहते हैं? जैसा कि मैंने पहले कहा था, सिर्फ़ हिंदी में लिखते हैं, मात्र यह कारण मेरे लिए संबंध जोड़ने के लिए पर्याप्त नहीं है। स्थल का सौंदर्य, उसकी धड़ाधड़ता के पहले उसका चरित्र है। वह सामने आ ही गया।

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09:47 बजे आलोक द्वारा।
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