यूँ तो आधा स लिखने की परंपरा नहीं है लेकिन व्याकरण की दृष्टि से गलत भी नहीं है। बहरहाल उम्मीद है कि गूगल वाले इसे जल्द ठीक कर देंगे।
तब तक खोज के लिए दो बार कंट्रोल दबाएँ।
यह रहा गूगल डेस्कटॉप का हिन्दी जालस्थल - कैसा लगा आपको? आजमा के बताएँ।Labels: क्षेत्रीयकरण, खोज, गूगल, तकनीक
12:10 बजे आलोक द्वारा।Labels: क्षेत्रीयकरण, तकनीक
16:36 बजे आलोक द्वारा।
Labels: अनुवाद, क्षेत्रीयकरण, तकनीक
17:53 बजे आलोक द्वारा।
यानी ब्लॉग्स ऑफ़ नोट। करारे नोटों वाले नहीं, वरन उल्लेखनीय चिट्ठे :)
और यह लिंग माले में है - वह भी बिना वीज़ा के।
गूगल भइया को इसके बारे में संदेश लिख दिया है। देखते हैं कितनी जल्दी ठीक होता है।Labels: अनुवाद-त्रुटि, क्षेत्रीयकरण, तकनीकी, भारतीयकरण, संगणक
08:20 बजे आलोक द्वारा।
हाँ, नीचे और भी हैं।
इतनी अपठित इसलिए रह गईं क्योंकि मेरी छन्नियाँ इस प्रकार की हैं कि चिप्पी लगाने के साथ साथ, इन संदेशों के लिए इनबॉक्स छोड़ें का विकल्प भी चुना गया था।
नतीजा यह कि चिप्पियों में तो अपठित डाक की संख्या लगातार बढ़ रही थी, लेकिन डाक खोलने पर डाक पेटी में संदेश इक्का दुक्का ही रहते थे। साथ ही, ज़्यादा डाक इकट्ठी करने से जीमेल को कोई दिक्कत नहीं है। याहू डाक की तरह ऊपर लाल खतरे का निशान नहीं आता है। साथ ही, अगर चिप्पियाँ ज़्यादा हों तो डाक खोलने पर सामने सामने अपठित की संख्या नहीं दिखती है, क्योंकि वह नीचे छिप जाती हैं। तो जिस प्रकार दीमक अंदर ही अंदर से लकड़ी को खोखला कर देती है, उसी प्रकार, मेरे अपठित संदेशों की संख्या हज़ार के करीब पहुँच गई। यह सब पिछले छः महीने में हुआ।
इसके मुझे कई खामियाजे भी भुगतने पड़े हैं - चिप्पी तो लगी है, अब एक-एक चिप्पी से शुरू करें तो आप शायद दूसरी चिप्पी लगी ताज़ी - और शायद ज़्यादा ज़रूरी डाक - को देर से पढ़ें। इसका आज एक निदान सोचा।
पहले तो सभी छन्नों से "इनबॉक्स छोड़ें" का विकल्प हटा दिया। इससे चिप्पी तो लगी रहेगी, लेकिन समयक्रम के अनुसार नए संदेश डाकपेटी में भी दिखेंगे।
दूसरा, हर चिप्पी के अपठित संदेशों को वापस डाकपेटी में ले आया।
नतीजा यह हुआ कि चिप्पियों के तहत अपठित तो हैं ही, साथ ही डाक पेटी में भी संख्या आ गई है, और सारी अपठित डाक नज़रों के सामने समयक्रम के अनुसार दिख रही है।
तो थोड़ी सुविधा तो हो ही गई है। वैसे मैं ज़रूरत से ज़्यादा लापरवाह हूँ, पर यदि आपको इसी प्रकार की समस्या हो - डाक पढ़ना टरकाने की - तो मेरा सुझाव है कि चिप्पियाँ तो लगाएँ, लेकिन संग्रहीत न करें।
साथ ही कुछ मीन मेख। आप देखेंगे कि तारांकित ठीक से नहीं लिखा आया है। इसी तरह यहाँ ज़बर्दस्ती खिंचाव पैदा किया गया है -
गूगल वालों को चिट्ठी लिखनी पड़ेगी। अब हम होते हैं नौ दो ग्यारह।Labels: क्षेत्रीयकरण, जीमेल, डाक-आयोजन, भारतीयकरण
18:04 बजे आलोक द्वारा।
लेकिन लगता है कि मुख पृष्ठ के अलावा और चीज़ों का अनुवाद अभी नहीं हुआ है। अरे नहीं, मैं गलत था।
सत्रारम्भ करने के बाद यह पन्ना आता है, अङ्ग्रेज़ी में -
लेकिन इसी पन्ने पर बदल के हिन्दी किया जा सकता है -
और यह रही इस बारे में गूगल की ओर से ही सूचना।
तो इन्तज़ार किस बात का है? भाषा बदलिए और आनन्द लीजिए।Labels: उपकरण, क्षेत्रीयकरण, ब्लॉगर
14:02 बजे आलोक द्वारा।
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