मुख : हिन्दी : आलोक : नौ दो ग्यारह

Can't see Hindi?

Why can't I see the Hindi section?

5.12.07

हिन्दी वेबसाइट

जी हाँ, स्थल का नाम है हिन्दी वेबसाइट। यहाँ लिखा भारतेंदु हरिश्चन्द्र जी का दोहा - या चौपाई, या सवैया या कवित्त ? मुझे फ़र्क नहीं पता - पसन्द आया -
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल। अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।
दिलचस्प बात यह है कि यहाँ एचटीएमएल और पेजमेकर सीखने के लेख भी हैं, ऐडसेंस का बेहिचक इस्तेमाल है, और एक दिलचस्प चिट्ठा भी है। बढ़िया काम है जी के ए जी। शायद वनस्पति आधारित चिकित्सा का भी एक विभाग बनाया जा सकता है।

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10:30 बजे आलोक द्वारा।
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4.12.07

गोकुल राजाराम - ऐडसेंस निर्माता

मेरे एक सहकर्मी ने खबर दी कि गोकुल राजाराम[अंग्रेज़ी] गूगल छोड़ रहे हैं। इस लेख से यह पता चला कि गोकुल ही गूगल के ऐडसेंस- ऐडवर्ड्स दल के नेता थे। दरअसल गोकुल जी के बारे में पहले भी अपने सहकर्मी सत्यप्रकाश जी के साथ चर्चा हुई थी, क्योंकि वह आईआईटी कानपुर में उनके तीन साल तक रूममेट थे। गोकुल १९९५ के आईआईटी कानपुर के कंप्यूटर साइंस[अंग्रेज़ी] के टॉपर थे। कंप्यूटर साइंस में भर्ती पाना तो वैसे ही कठिन है, वह भी कानपुर आईआईटी में, उसमें भी पहला नंबर आना - कोई मज़ाक नहीं है। मेरे सहकर्मी बताते हैं कि गोकुल की याददाश्त ऐसी थी जैसे कि चाचा चौधरी की - यानी कंप्यूटर से भी तेज़। पढ़ने की गति बहुत ही तेज़, और जो पढ़ते थे वह भी - चाहे उपन्यास ही हो - हमेशा के लिए याद। मेरे जैसा अगर कोई अंग्रेज़ी उपन्यास पढ़ता है तो किताब खत्म होते होते कहानी तो याद रहती है पर पात्रों के नाम भूल जाते हैं। पर आप उनसे अभी भी पूछ सकते हैं कि कौन से उपन्यास में कौन से पात्र थे और क्या कहानी थी, वह बता देंगे। और सबसे बड़ी बात जो मेरे सहकर्मी उनके बारे में बताते हैं वह यह है कि उनमें ज़रा भी घमंड की भावना नहीं है। आमतौर अपने जैसी निपुणता वालों के साथ तक ही अपना मेलजोल रखते हैं। पर इनके साथ ऐसा कभी नहीं था। न कोई घमंड न कोई दंभ। सोचता हूँ, कोई आईआईटी में भर्ती होने के बाद भी नंबर वन रहने की तमन्ना रखे और उसे पूरा भी करे - कितना दृढ़ निश्चय चाहिए। गोकुल लगभग एक साल तक आईआईटी के समय दिन में केवल चार घंटा सोते थे ऐसा मेरे सहकर्मी बताते हैं। उन्होंने पहले से ही सोचा हुआ था कि अनुसंधान के बजाय व्यापार की ओर बढ़ेंगे, और वही किया - एमआईटी के स्लोन[अंग्रेज़ी] से एमबीए किया था, और फिर गूगल में भर्ती हुए। गूगल हर काम खुफ़िया तरीके से ही करता है, आज ही पता चला कि गूगल के ऐडसेंस के पीछे भी उन्हीं का हाथ है, जब उनके छोड़ने की खबर आई। गूगल के अन्दर भी उनकी काफ़ी धाक है, वह इस लेख की टिप्पणियों[अंग्रेज़ी] से पता चलता है। आमतौर पर मितभाषी गूगलियों ने भी काफ़ी टिप्पणियाँ की हैं। आज उनकी बदौलत गूगल तो इतनी ऊँचाई तक पहुँची ही है, कोई भी आम प्रकाशक आर्थिक रूप से स्वतन्त्र रहते हुए प्रकाशन करने की सोच सकता है, उसे बड़े स्थलों और कंपनियों पर निर्भर रहने या उनके द्वारा डकारे जाने की चिंता करने की ज़रूरत नहीं है। स्वतन्त्र रूप से प्रकाशन करने के लिए प्रोत्साहित करने में गोकुल की बनाई ऐडसेंस का बहुत बड़ा हाथ है। हाशिये पर मौजूद भाषाएँ, विचार और संस्थाएँ भी इस आर्थिक संबल के जरिए अपनी बात उतनी ही दृढता से आगे रख सकती हैं जितनी मुख्यधारा के प्रकाशक, सशक्त भाषाओं और आंदोलनों के प्रकाशक। क्या गोकुल ने सोचा था कि ९५ में आईआईटी से निकलने के बाद वह एक ऐसी चीज़ बना देंगे जो पूरी दुनिया की नक्शा ही बदल देगी? मुझे तो लगता है कि ज़रूर सोचा होगा। बिना योजना के कोई कार्य पूरा नहीं होता और केवल योजना बनाने से सिर्फ़ शेखचिल्ली पैदा होते हैं। गोकुल ने योजना भी बनाई और उस पर क्रियान्वयन भी किया। इतना ही नहीं, ऐसा व्यक्तित्व कि कोई रूममेट आज भी - १३ साल बाद - उन्हें याद करे - यही कह सकते हैं कि धरती माता धन्य हुई ऐसे सपूत[अंग्रेज़ी] को पा के। मुझे विश्वास है कि अभी और भी आना बाकी है गोकुल की ओर से! जैसे सरकिट कहता है, अपुन के पास एक और बम है - ज़रूर गोकुल के पास और भी हैं - और हम सबके पास भी।

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10:12 बजे आलोक द्वारा।
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28.11.07

दैट्स हिन्दी

इनके चिट्ठे वाले वर्ग की तो बात ही निराली है - अपने स्थल पर अलग फ़्रेम में जालस्थल दिखा रहे हैं - बिना अनुमति के - पर उसके अलावा बाकी वर्ग तो पसंद आए। वैसे इस अग्रेज़ीमय हिन्दी स्थल की तो नुक्ताचीनी हो चुकी है, पर मुझे हॉलीवुड वाली तस्वीरें खास पसंद आईं। नो नो, दैट्स अंग्रेज़ी - हिन्दी इज़ नौ दो ग्यारह!

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18:55 बजे आलोक द्वारा।
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एक लैपटॉप प्रति बच्चा

आप चाहें तो बच्चों के हिसाब से अनुवाद कर सकते हैं या मौजूदा अनुवाद सुधार सकते हैं। पहले रवि ने भी उल्लेख किया था इसका, अब हम होते हैं नौ दो ग्यारह।

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08:11 बजे आलोक द्वारा।
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26.11.07

९-२-११ की टिप्पणी नीति

नौ दो ग्यारह पर आपकी टिप्पणियों का स्वागत है। यदि आप यहाँ टिप्पणी करते हैं या उनका पुनरुपयोग करते हैं तो इन नीतियों के अधीन करें -
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  2. मेरे द्वारा यहाँ या अन्यत्र लिखित टिप्पणियों का पुनरुपयोग या पुनर्प्रकाशन मुझसे अनुमति ले कर ही करें।
यदि आपके इस नीति संबंधी कोई प्रश्न हों तो कृपया टिप्पणी के जरिए पूछ लें :)

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17:03 बजे आलोक द्वारा।
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22.11.07

कंप्युत्रिका

कंप्यूटर के बारे में पत्रिका - क्या क्या देखना चाहेंगे आप इसमें? बताएँ, सत्रारंभ करके। कच्चा खाका। और चर्चा करना चाहें तो दीवान डाक सूची की सदस्यता भी ले सकते हैं। अब हम होते हैं नौ दो ग्यारह।

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21:32 बजे आलोक द्वारा।
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17.11.07

गुरुजी पर गुरुजी खोजिए + ब्लॉगर से हिंदी गायब

गुरुजी का हिंदी जालस्थल तो शायद पहले से ही था पर मैंने आज ही देखा। खोज करने पर पहला पन्ना काफ़ी धीरे आया पर परिणाम अच्छे हैं। अधिकतर भारतीय स्थल, जैसा कि गुरुजी कहते हैं। और मज़ेदार बात थी कि इनकी हिंदी काफ़ी अच्छी है, अनूदित सी नहीं लगती। इस बीच ब्लॉगर से हिंदी का विकल्प ही नौ दो ग्यारह हो गया है ऐसा लगता है। जब तक वापस नहीं आता है तब तक जापानी ही झेलो। ब्लॉगर-हिंदी-में-नहीं मतलब, ब्लॉगर का स्थल तो हिंदी में है, पर ब्लॉग्स्पॉट पर प्रकाशन का हिंदी वाला विकल्प ही गायब है। ब्लॉगर-हिंदी-में-पर ब्लॉग्स्पॉट नहीं शायद इस त्रुटि को ठीक कर रहे हों, कुछ समय बाद फिर वापस आजाए।

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10:59 बजे आलोक द्वारा।
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12.11.07

इण्डलिनक्स वालों की गपशप १३ नवंबर २००७ को

यह गपशप irc.freenode.net पर होगी, #indlinux पर। चर्चा के विषय वही होंगे जो आमतौर पर इण्डलिनक्स में होती है, बस डाक के बजाय थोड़ी और तुरत फुरत। यदि आपको यह न पता हो कि आईआरसी क्या होता है, तो यह ऍचटीटीपी या ऍफ़टीपी की तरह का ही एक और शगूफ़ा है। बंगलोर में पहली बार देखा था - कई साइबर कैफ़ों में रहता था। आजकल नौ दो ग्यारह हो चला है। आईआरसी के यूआरएल भी होता हैं, जो कि irc:// से शुरू होते हैं। जैसे ऍचटीटीपी मूलतः ८० का इस्तेमाल करता है, वैसे ही आईआरसी ६६६७ का इस्तेमाल करता है। और हाँ, इसमें से अधिकतर जानकारी यह लेख लिखने के पहले मुझे भी नहीं थी। विंडोज़ के जरिए शामिल होना चाहें तो ऍमआईआरसी का इस्तेमाल करें, लिनक्स के जरिए शामिल होना चाहें तो ऍक्स-चैट का इस्तेमाल करें, और सेब के जरिए, पता नहीं, कभी आजमाया नहीं। कल आजमाता हूँ। तो मिलते हैं, irc://irc.freenode.net#indlinux पर, रात नौ से ग्यारह हिंदुस्तानी समयानुसार।

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16:38 बजे आलोक द्वारा।
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7.11.07

टिप्पणियाँ नहीं दिख रही हैं

इस चिट्ठे पर ताज़ी टिप्पणियाँ नहीं दिख रही हैं, पर वह मौजूद हैं, नौ दो ग्यारह नहीं हुई हैं। यदि किसी को ऐसी समस्या आई हो तो बताएँ समाधान क्या हो सकता है। टिप्पणियों की मध्यस्थता लागू नहीं है। आप जवाब टिप्पणी से दे सकते हैं, यहाँ नहीं दिखेंगी पर मुझे डाक से तो मिल ही जाएँगी। शुक्रिया :)।

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09:30 बजे आलोक द्वारा।
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6.11.07

नोट का ब्लॉग और माले

हिंदी वाले ब्लॉगर को आपने देखा होगा तो नोट का ब्लॉग और माले के बारे में तो जानते ही होंगे। पर अगर नहीं, तो जान जाइए अब। ये है नोट का ब्लॉग। ब्लॉगर नोट का ब्लॉग यानी ब्लॉग्स ऑफ़ नोट। करारे नोटों वाले नहीं, वरन उल्लेखनीय चिट्ठे :) और यह लिंग माले में है - वह भी बिना वीज़ा के। ब्लॉगर माले गूगल भइया को इसके बारे में संदेश लिख दिया है। देखते हैं कितनी जल्दी ठीक होता है।

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08:20 बजे आलोक द्वारा।
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