31.12.04
30.12.04
यह बात अलग है कि आप जब जाल से जुड़े नहीं होते हैं तो भी डब्बे में यही लिखा रहता है कि सब कुछ भेज दिया गया है।
11:57 बजे आलोक द्वारा।
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पता चला कि इसे
सूनामी नहीं,
त्सूनामी बोलना चाहिए। ऐसी चीज़ का नाम बिगाड़ने से पहले तो मैं 60,000 बार सोचूँगा। क्योंकि तुक्के की ही बात है कि मैं या मेरी जान पहचान वाला कोई उस समय
मरीना पर नहीं था।
07:06 बजे आलोक द्वारा।
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28.12.04
27.12.04
समुद्री तूफ़ान - को जापानी में सुनामी बोलते हैं, यानी बन्दरगाह के निकट की लहर। दरअसल ये बहुत लम्बी - यानी सैकड़ों किलोमीटर चौड़ाई वाली लहरें होती हैं, यानी कि लहरों के निचले हिस्सों के बीच का फ़ासला सैकड़ों किलोमीटर का होता है। पर जब ये तट के पास आती हैं, तो लहरों का निचला हिस्सा ज़मीन को छूने लगता है, - इनकी गति कम हो जाती है, और ऊँचाई बढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में जब ये तट से टक्कर मारती हैं तो तबाही होती है। गति 400 किलोमीटर प्रति घण्टा तक, और ऊँचाई 10 से 17 मीटर तक। यानी पानी की चलती दीवार। और वह भी खारा वाला।
अक्सर समुद्री भूकम्पों की वजह से ये तूफ़ान पैदा होते हैं। प्रशान्त महासागर में बहुत आम हैं, पर बङ्गाल की खाड़ी, हिन्द महासागर व अरब सागर में नहीं। इसीलिए शायद भारतीय भाषाओं में इनके लिए विशिष्ट नाम नहीं है।
06:34 बजे आलोक द्वारा।
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26.12.04
23.12.04
20.12.04
12.12.04
11.12.04
अपने लॅप्ट़प पर यह गाना सुना।
कौन सी फ़िल्म? गायिका? अभिनेत्री?
जब नहीं आए थे तुम
तब भी मेरे साथ थे तुम
जब नहीं आए थे तुम
तब भी मेरे साथ थे तुम
दिल में धड़कन की तरह
तन में जीवन की तरह
मेरी धरती मेरे मौसम
मेरे दिन रात थे तुम
जब नहीं आए थे तुम
तब भी मेरे साथ थे तुम
फूल खिलते थे
तो आती थी
तुम्हारी खुश्बू
फूल खिलते थे
तो आती थी
तुम्हारी खुश्बू
हर हसीं शाम जगाती थी
तुम्हारा जादू
आइने में मेरी हर दिन की
मुलाकात थी तुम
मेरी धड़कन की तरह
मेरे जीवन की तरह
मेरी धरती मेरे मौसम
मेरी दिन रात थे तुम
जब नहीं आए थे तुम
तब भी मेरे साथ थे तुम
अध मुँदी दी आँख में
सजता हुआ एक ख्वाब थे तुम
अध मुँदी दी आँख में
सजता हुआ एक ख्वाब थे तुम
पहली बरसात में भीगा हुआ मेहताब थे तुम
होंठ मेरे थे मगर इनके हर ... थे तुम
दिल में धड़कन की तरह
तन में जीवन की तरह
मेरी धरती
मेरे मौसम
मेरे दिन रात थे तुम
जब नहीं आए थे तुम
तभ भी मेरे साथ थे तुम
बस दो सवाल:
होंठ मेरे थे मगर इनके हर क्या थे तुम?
मेहताब यानी?
जब नहीं आए थे तुम तो गूगल के पास नहीं है।
08:04 बजे आलोक द्वारा।
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10.12.04
7.12.04
6.12.04
5.12.04
यह तो पता चला कि 24सों घण्टे उतने ही पैसे लगेंगे। लेकिन ये कहाँ से फ़ोन करने के पैसे हैं? यह तो कहीं लिखा ही नहीं है, या फिर लिखा है लेकिन दिख नहीं रहा है। न यही कि कौन सी मुद्रा में दाम लिखे हैं।
दो चार डोमेन नामों के लिए अपना जीमेल पता क्या दिया, धड़ाधड़ अङ्ग वैशालीकरण की डाक आने लगी। पर ये तो होना ही था। मतलब वैशालीकरण नहीं, कचरा डाक का आना। बकरी की माँ कब तक ख़ैर मनाती।
13:10 बजे आलोक द्वारा।
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4.12.04
यूनिकोडित, हिन्दी अखबार। लेकिन लगता है कि ख़बरें पढ़ने के लिए पञ्जीकरण करना पड़ता है। और उसके लिए नोट लगते हैं। कोई गल नहीं। फिर कभी सही। पर सामग्री काफ़ी है यहाँ लगता है। सोचा कि पञ्जीकरण के बारे में शिकायत करूँ लेकिन कोई डाक पता नहीं मिला। आपको मिले तो बताएँ। इस बीच थोड़ा शोक,
रायपुर टुडे अब मौजूद नहीं है।
गूगल बड़ा तेज़ छोकरा है, चन्द घण्टों में सब कुछ घोट लेता है। पता चला
तत्काल के बारे में। अब
ठाकुर का हाथ माँग लिया तो क्या हुआ - हाँ, अब तो अमेरिका में भी गैर कानूनी है। मुआफ़ी।
08:32 बजे आलोक द्वारा।
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3.12.04
विजय ठाकुर, यह हाथ मुझे दे दो। जो इतनी कविताएँ लिख डालते हैं। अपुन तो कविता के नाम से ही नौ दो ग्यारह होने लगते हैं। ईश्वर प्रदत्त कला है, क्या कर सकते हैं। पर देख रहा हूँ जाल पर कविताओं का भरमार हो रहा है।
इस बीच देखा कि हिन्दी के चिट्ठों की इतनी भरमार हो गई है कि आराम से पन्द्रह मिनट लगते हैं सबको दिन में एक बार देखने में। छः महीने पहले यह काम दो मिनट में हो जाता था। बढ़िया है। पता चला कि
तोता चश्म का मतलब क्या होता है,
फ़ुरसतिया जी की बदौलत। देखते हैं गूगल
तोता चश्म को कब तक पकड़ता है। अभी तक तो खाली लौट रहा है।
06:04 बजे आलोक द्वारा।
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2.12.04
1.12.04
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