मुख : हिन्दी : आलोक : नौ दो ग्यारह

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29.4.07

मैं और मेरा सेब

मैं और मेरा सेब - अक्सर यह बाते करते हैं, कि ये होता तो क्या होता, कि वो होता तो क्या होता। सेब यह सेब इतना सुन्दर है कि सारे जालस्थल बदसूरत लगने लगे हैं, सो होते हैं हम नौ दो ग्यारह।
16:17 बजे आलोक द्वारा।
14 छींटाकसी
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