28.2.08
27.2.08
18.2.08
15.2.08
12.2.08
हिन्दी में समोसे भेजने के लिए ज़रूरी नहीं कि फ़ोन में हिन्दी हो, न ही पढ़ने के लिए। मेरे नोकिया ६२६० में हिन्दी नहीं है, पर पीसी पर
नोकिया पीसी स्यूट लगाया, फ़ोन को सी ए ५३ केबल से जोड़ा, और पहले सन्देश लिखा - मोबाइल से नहीं, पी सी से -

फिर समोसा भेजा -

समोसा पहुँचा दिया गया -

क्योंकि समोसा मैंने भेजा तो खुद ही को था, इसलिए टूँ टूँ आ गई एक सेकिंड बाद।
तो हमने समोसे के लिए हाथ बढ़ाया,

और पूरा का पूरा हिन्दी में मिला!

जबकि फ़ोन को न हिन्दी के समोसे बनाना आता है, न खाना - सिर्फ़ डब्बे ही दिखते हैं फ़ोन में।
केबल नहीं हो तो पीसी और फ़ोन दोनो में
नीलदन्त हो तो भी चलेगा! इस सब को करने के लिए
जी पी आर ऍस की भी ज़रूरत नहीं है।
यानी भले ही हिन्दी फ़ोन पर नहीं दिखे, केबल या नीले दाँत तो आप उसमें गाड़ ही सकते हैं!
जब तक रहेगा नोकिया का केबल, समोसे में रहेगी हिन्दी।
(तुक नहीं मिली, इसलिए होता हूँ नौ दो ग्यारह।)
Labels: अन्तर्राष्ट्रीयकरण, तकनीक, मोबाइल, विण्डोज़, समोसे
22:44 बजे आलोक द्वारा।
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10.2.08
सरपट दौड़ने वाला ब्रोडबैंड शादी की उस दावत की तरह ही है जिसमें पकवान इतने ज़्यादा और इतनी मात्रा में होते हैं कि इंसान आधा सामान थाली में रख नहीं पाता और बाकी आधा थाली में ले के भी फेंक ही देता है। उसके मुकाबले डायलप - की कल्पना करना ही थोड़ा मुश्किल होता है - हॉस्टल में महीने के उन आखिरी दिनों की तरह जब मेस किसी कारण से बन्द हो जाती थी और पिताजी की ओर से आठ सौ रुपए के ड्राफ़्ट की प्रतीक्षा रहती थी। जो लोग आईआईटी आदि से पढ़े हैं उन्हें इस बात की कल्पना कर पाना थोड़ा मुश्किल होगा, लेकिन
मेरे कॉलेज के हॉस्टल की मेस में कभी कभार ऐसा हो जाता था।
पर अब ब्रोडबैंड के सरपट घोड़े से
उतरना पड़ा है, क्योंकि
मेरे गाँव ढकोली में इस समय तार वाले फ़ोन हैं नहीं, अलबत्ता मोबाइल खूब हैं।
तो मैं चला बैलगाड़ियों की खोज में। खोजबीन करने के बाद संक्षेप में बताता हूँ कि क्या जोड़तोड़ करने पड़े।
- एयरटेल से जी पी आर ऍस सुविधा ली। एयर्टेल शिमला के उच्चाधिकारी सुदीप जी को इसके लिए धन्यवाद।
- सुविधा लेने के बाद 52567 पर Mo लिख कर समोसा भेज के जी पी आर ऍस का जमाव स्थापित किया
- अपने नोकिया 1100 को ताक पर रख के धर्मपत्नी जी का नोकिया 6260 हथियाया, और उसमें "डिफ़ॉल्ट ऍक्सेस पॉइंट" "मोबाइल ऑफ़िस" किया।
- मोबाइल चिट्ठाजगत खोल के देखा। खुल गया, लेकिन डब्बे दिखे। मोबाइल चिट्ठाजगत - रोमन तो फिर भी ठीक चल रहा था। यानी कि जाल से जुड़ तो गया, पर हिन्दी वाले काम नहीं हो सकते थे।
- नोकिया के जालस्थल से नोकिया पीसी स्यूट 6.85.14.1 उतारा। यह काम दफ़्तर से किया क्योंकि घर पर तो अन्तर्जाल था ही नहीं, यूऍसबी अँगूठी में ले के आया कुछ 26 मेगाबाइट का है।
- उसे स्थापित किया।

- नोकिया 6260 के लिए सीए-53 यूएसबी केबल ले के आया, पंचकूला से, जो कि 1580 रुपए की मिली। एक और केबल इसके लिए उपयुक्त है, डी के यू - 2, लेकिन वह दुकान पर था नहीं।
- केबल के जरिए फ़ोन को पीसी से जोड़ा।
- नोकिया पीसी स्यूट में मौजूद "कनेक्ट टु इंटर्नेट" पर चटका लगाया, और स्वचालित जमाव में एयर्टेल इंडिया चुना।

- जोड़ा।
- जुड़ गया।

- यह प्रविष्टि लिखी
अब हम होते हैं नौ दो... नहीं अभी नही।
कुछ और सवाल जो मेरे मन में हैं और आपके मन में भी होंगे शायद।
- कुल जमा ज़रूरतें थीं - जी पी आर ऍस वाला फ़ोन, जी पी आर ऍस सुविधा, नोकिया पीसी स्यूट, केबल अनिवार्य नहीं है, चाहें तो नीलदंत से भी जोड़ सकते हैं, पर फिर ऊपर लिखा 460.8, 110 हो जाता है।
- बी ऍस ऍन ऍल के जी पी आर ऍस का जमाव कैसे करते हैं मुझे नहीं पता है। आपको पता हो तो बताएँ।
- नोकिया के अलावा अन्य फ़ोनों के बारे में मेरा अनुभव नहीं है, आपको हो तो बताएँ
- हिन्दी + जी पी आर ऍस की सुविधा वाले मोबाइल फ़ोन हैं नोकिया 3110सी, और नोकिया 6085। और भी हैं, पर सबसे सस्ते यही हैं। 6085 केवल 4800 रुपए का है, 3110सी उससे भी थोड़ा कम ही है।
- किसी भी एस 60 फ़ोन यानी नोकिया ई सीरीज़ या ऍन सीरीज़ - में हिन्दी नहीं है।
- नोकिया 3110सी का केबल, सीरियल केबल है, जो कि नोकिया 6260 के केबल से सस्ता है।
- पंचकूला में 11 सेक्टर की नोकिया की दुकान के दरबान तक को भी फ़ोनों के बारे में इतनी जानकारी है कि नोकिया के शोरूम के प्रशिक्षित कर्मचारियों को शर्मिंदा कर दे। उन्हें धन्यवाद।
- जी पी आर ऍस का खर्चा कितना आएगा, पता नहीं, महीने के अन्त में ही मालूम चलेगा। आपको पता हो तो बताएँ।
- सेब और लिनक्स के लिए जमाव अभी नहीं किया है, बाकी है।
- नोकिया, एयर्टेल, बी ऍस ऍन ऍल - किसी का भी जालस्थल हिन्दी में नहीं है। न ही नोकिया पीसी स्यूट हिन्दी में है।
अब हम होते हैं नौ दो ग्यारह :)
Labels: जीपीआरएस, तकनीक
14:28 बजे आलोक द्वारा।
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6.2.08
कई साल पुरानी बात है,
देबू ने मुझे कुछ फ़ोकट के खाके दिखाए थे और कहा था कि
देवनागरी.नेट की कुछ हालत सुधारो, थोड़ा सुन्दर बनाओ उसे। मैंने नहीं किया, ऊपरी ओर से तो यही कह के कि सामग्री ज़्यादा ज़रूरी है, पर सच तो यह है कि सी ऍस ऍस से डर लगता था, पर अभी अन्ततः कुछ सी ऍस ऍस करने के बाद लगा कि पहले ही यह काम करता तो बहुत मेहनत बचती।
नई सामग्री जोड़ने में भी डर लगता था, क्योंकि सभी पन्ने एक जैसे रखना ज़रूरी था। यह डर कुछ वैसा ही था जैसा कि
इंस्क्रिप्ट सीखने के पहले हिन्दी लिखने में लगता था, पर उसके बाद आसानी से ज़्यादा और सही लिखना शुरू हुआ। वही चीज़ अब सी ऍस ऍस के साथ है। अब नए पन्ने जोड़ना काफ़ी आसान हो गया है, पर चक्कर यही है कि आजकल ब्रोडबैंड
ठप्प है, इसलिए काम और आगे नहीं बढ़ पा रहा है वरना हर रोज एक नया पन्ना जोड़ने का तो इरादा था ही।
इसीलिए कहते हैं, माउण्टेन ड्यू पियो, आगे बढ़ो।
और चीज़ें जिनसे फ़िलहाल डर लगता है -
- जावास्क्रिप्ट
- गुरमुखी
- तस्वीरों को छोटा बड़ा करना
- अपनी आवाज़ रिकॉर्ड करके पॉडकास्ट करना
जय हो
सी ऍस ऍस की, और जय हो
सी ऍस ऍस पुष्टिकर्ता की।
Labels: तकनीक, सी ऍस ऍस
16:37 बजे आलोक द्वारा।
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5.2.08
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