१. जब भी आप गूगल पर खोज करते हैं, तो हिंदी वाले गूगल का इस्तेमाल करें। इसे लागू करना तो बहुत आसान है, बस एक बार प्रिफ़रेंसेज़ या वरीयताएँ में जा के हिंदी चुनें। बस एक बार। इसी तरह जब भी किसी साइबरकैफ़े या दोस्त के यहाँ गूगल पर खोज करें, तो भी हिन्दी वाले गूगल का इस्तेमाल करें। समय लगा - ३० सेकिंड।
२. जब भी आप जीमेल का इस्तेमाल करते हैं, तो हिन्दी वाले जीमेल का इस्तेमाल करें। इसे लागू करना भी बहुत आसान है। जीमेल में सेटिंग्स पर जा के भाषा बदलें। जब भी आप किसी मित्र को जीमेल का इस्तेमाल करते देखते हों, तो उन्हें बताएँ कि वे इसे हिन्दी में बी बदल सकते हैं। समय लगा – ३० सेकिंड।
३. जब भी आप किसी को डाक लिखते हैं, तो नीचे दस्तखत –हस्ताक्षर – सिग्नेचर - की जगह होती है, यह भी आप जीमेल में सेटिंग्स के जरिए बदल सकते हैं। वहाँ पर हिन्दी में कुछ छोटा से लिखें, अपना नाम, अपना चिट्ठे का नाम, और अपने या किसी और स्थल की कड़ी जो हिन्दी में हो। इससे जो भी आपकी चिट्ठी पढ़ेगा – भले ही वह हिन्दी में नह हो – पर दस्तखत हिंदी में होने से लोगों में उत्सुकता बढ़ेगी। यह आपको एक ही बार करना होगा। समय लगा – ३० सेकिंड।
४. अपने फ़ोन की फ़ोन सेटिंग में देखें कि हिंदी की सुविधा है या नहीं। अगर है तो हिंदी लागू करें। इसी तरह अगर आपके दोस्तों के फ़ोन में हिंदी की सुविधा है तो उन्हें भी बताएँ कि वह फ़ोन की शक्ल हिंदी वाली कर सकते हैं। हिंदी एक ही बार लागू करनी होगी। जब भी आप कोई नया मोबाइल खरीदते हैं तो दुकानदार से यह ज़रूर पूछें कि इसमें हिंदी पढ़ना लिखना हो सकता है या नहीं। लोगों के पास मोबाइल तो होते हैं पर हिंदी न होने की वजह से डाक वगैरह नहीं जाँचते। तो कीजिए फ़ोन सेटिंग से हिंदी लागू। समय लगा – ३० सेकिंड।
बस इतना ही। सिर्फ़ दो मिनट। कोई सरकारी अनुदान नहीं चाहिए। कोई हिंदी का रोना रोने वाले लेख नहीं चाहिए। चाहिए तो सिर्फ़ आपके दो मिनट। समय शुरू होता है अब।
आप और मैं नहीं करेंगे तो आज से पाँच साल बाद आपका सब्ज़ी वाला कैसे करेगा? उसे हिंदी आती है, पर कंप्यूटर का इस्तेमाल करने के लिए हिंदी आना काफ़ी है, यह खबर उस तक पहुँचेगी नहीं।
दो मिनट में यह सब कर लेने के बाद टिप्पणी करके बताइएगा ज़रूर, यूँ ही नौ दा ग्यारह न होइएगा!
ताकि कोई यह न कह सके कि हिंदी सिर्फ़ कवियों और पत्रकारों की भाषा है।
यूँ तो खबर बासी है पर अब गूगल डॉक्स ४८ भाषाओं में उपलब्ध है, जिनमें हिन्दी के अलावा ८ भारतीय भाषाएँ, ओड़िया, बांग्ला, कन्नड़, गुजराती, तमिळ, तेलुगु, मराठी, मलयालम, में भी शामिल है। तो बताइए अपने मित्रों को, लाभ उठाएँ इस सुविधा का – यह है भी मुफ़्त।
ये जो कारस्तानियाँ आप देख रहे हैं, वह है ट्विटर की बदौलत। ट्विटर यानी चहकना। जिस तरह चिड़ियाँ सुबह से शाम चहकती हैं, उसी तरह आप भी चहक सकते हैं - रात में भी।
शुरू में तो मुझे पकाऊ चीज़ लगती थी, पर अब तो इसका नशा आ गया है। बस अफ़सोस यह है कि हिन्दी में चहकने वाले लोग थोड़े कम हैं। अगर आप भी चहकना शुरू करें तो मज़ा आ जाए।
चिड़ियाँ चहकती रहती हैं, पर आपको समझ नहीं आता कि वह कह क्या रही हैं, लेकिन चहकना सुनना अच्छा लगता है। ऐसा ही है ट्विटर पर चहकना। किसी भी समय सिर्फ़ एक सवाल का जवाब दें - कि इस वक़्त आप क्या कर रहे हैं?
इसमें आप जालस्थल से या अपने मोबाइल से सन्देश भेज सकते हैं - इतना ही नहीं, इसके जरिए आप मुफ़्त के समोसे भी पा सकते हैं - और भेज भी सकते हैं।
चलिए देखते हैं क्या क्या सुविधाएँ हैं यहाँ।
सबसे पहले ट्विटर.कॉम पर जा के खाता खोलना होगा।
वहाँ पर अपना डाक पता देना होगा, उसकी पुष्टि करनी होगी,
और साथ ही अपना मोबाइल नम्बर भी दे सकते हैं(वैकल्पिक, लेकिन मुफ़्त समोसे उसके जरिए ही आएँगे न)।
अब आप अपने ट्विटर पर सन्देश जोड़ते जा सकते हैं, ट्विटर के जालस्थल के जरिए, या फिर मोबाइल से, मोबाइल से सन्देश भेजने पर पैसे लगेंगे।
आप जो सन्देश भेजते हैं वह सबको दिखेंगे - यानी पूरी दुनिया को। इसलिए ध्यान दें, गोपनीय निजी बातें, फ़ोन नम्बर और डाक पते न भेजें। लेकिन आप चाहें तो अपने सन्देश गोपनीय रख सकते हैं, फिर केवल आपके पसन्दीदा लोगों तक ही यह सन्देश जाएँगे।
इसके अलावा, यदि आप किसी खास व्यक्ति तक ही अपनी बात पहुँचाना चाहते हैं तो "Direct Message" का इस्तेमाल करें। इससे उस व्यक्ति तक डाक पहुँचेगी, और यदि मोबाइल का विकल्प चुना हो तो ऍसऍमऍस जाएगा।
इसी प्रकार, यदि आप चाहते हैं कि जब कोई और सन्देश भेजे तो आपके मोबाइल पर सन्देश आए, तो आप "Device Updates" को लागू कर सकते हैं।
खास बात यह है कि छोटे छोटे सन्देश - आप अपनी इच्छानुसार जब चाहें पढ़ सकते हैं। आपको डाक के जरिए परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। साथ ही मोबाइल पर भी सन्देश प्राप्त कर सकते हैं।
जहाँ तक मेरा अनुमान है, भारत में समोसे प्राप्त करने के कोई पैसे नहीं लगते। यह गलत भी हो सकता है, आपकी सेवा पर निर्भर है, पर यदि यह सही है तो "Direct Message" के जरिए आप दनादन मुफ़्त का माल खा सकते हैं। एक हफ़्ते में 250 तक सन्देश प्राप्त किए जा सकते हैं। मुफ़्त समोसे न हों तो भी चहकने में मज़ा तो आता ही है।
तो इन्तज़ार किस बात का है आप भी शुरू होइए न। और हम होते हैं नौ दो ग्यारह। सवाल हों तो पूछें!
08:35 बजे आलोक द्वारा।Labels: निजी
22:18 बजे आलोक द्वारा।पिछली बार लिखा था कि जालस्थलों के स्वामी अपने स्थलों में हिन्दी के तमगे कैसे लगा सकते हैं। इससे पाठक रूपी यात्रियों और पटरी के दूसरी तरफ़ मँडराने वाले खोजी कुत्तों, दोनो तक पहुँचने में सुविधा होगी ऐसी आशा है।
पर साफ़ बात है कि लेखक दस हैं तो पाठक सौ, चाहे अंग्रेज़ी हो या हिन्दी। यानी जितने लोग लिखते हैं उससे कई गुना लोग पढ़ते हैं। अतः पाठक कैसे बताएँ कि उन्हें हिन्दी आती है, या हिन्दी के स्थल पसन्द करते हैं?
1. अपने ब्राउज़र में जा के भाषा पसन्द में हिन्दी को शामिल करें, और उसे सबसे ऊपर करें। ऐसा करने से कई भाषाओं में उपलब्ध स्थल होने पर, यदि हिन्दी में भी वह स्थल है तो आपको हिन्दी वाला दिखाया जाएगा, पहले से ही, स्थल पर पहुँचने के बाद भाषा बदलने की ज़रूरत नहीं होगी।
यह आप फ़ायर्फ़ाक्स में ऐसे कर सकते हैं,

इण्टर्नेट ऍक्स्प्लोरर में ऐसे कर सकते हैं,

ऑपरा में ऐसे कर सकते हैं,

जोड़ने के बाद हिन्दी को सबसे ऊपर लाना न भूलें।

साथ ही, जालराज नज़र रखते हैं कि किस किस यात्री ने कौन सी भाषा को सबसे ऊपर रखा है - उन्हें इशारा मिलेगा कि हिन्दी के स्थल पसन्द करने वाले लोग भी काफ़ी हैं, और वह उस दिशा में काम करेंगे।
2. अपनी प्रचालन प्रणाली - यानी ऑपरेंटिंग सिस्टम - की भाषा हिन्दी करें। जब भी आप किसी स्थल पर जाते हैं तो आपका एक हरकारा उसे यह बताता है कि आपका ब्राउज़र कौन सा है, प्रचालन प्रणाली कौन सी है, भाषा कौन सी है। हिन्दी में प्रचालन प्रणाली करने से आपका हरकारा स्थल को यह बताएगा कि अगला हिन्दी में शायद चीज़ें पसन्द करे। हर स्थल का प्रबन्धक भाषा के अनुसार आँकड़े देखता रहता है और भाषा हिन्दी होने पर हिन्दी के आँकड़े प्रबन्धकों को अधिक दिखेंगे, और वह भी हिन्दी में स्थल बनाने को प्रेरित होंगे।
विण्डोज़ के लिए आप हिन्दी वाला विंडोज़ प्राप्त कर सकते हैं।
हिन्दी वाले लिनक्स के लिए आप इण्डलिनक्स की मदद ले सकते हैं। अंग्रेज़ी में थोड़ी और विस्तृत जानकारी।
सेब पर आप हिन्दी का लोकेल चुन सकते हैं। अंग्रेज़ी में थोड़ी और जानकारी।
3. अन्ततः यदि आप अपने किसी साथी को अपने यन्त्र की कोई छवि निकाल के भेजते हैं, या फिर अपने स्थल पर कोई छवि छापते हैं, तो कोशिश करें कि हिन्दी वाली छवि छापें या भेजें, जैसे कि ऊपर इण्टर्नेट ऍक्स्प्लोरर की छवि है। इससे लोगों में कौतूहल बढ़ेगा, और अधिक लोग हिन्दी का इस्तेमाल करेंगे, उससे अधिक जालराजों की हिन्दी के प्रति जागरूकता बढ़ेगी, और हिन्दी में सामग्री की बढ़ोतरी होगी।
पहले दो बिन्दु आपको बस एक ही बार करने होंगे, और वह दोनो करने के बाद आप जब भी छापने के लिए कोई छवि निकालेंगे, तो उसमें हिन्दी स्वतः ही आएगी। यह काम आप अपने दफ़्तरी यन्त्र पर भी कर सकते हैं, मैंने किया है।
Labels: तकनीक
14:11 बजे आलोक द्वारा।Labels: निजी
10:07 बजे आलोक द्वारा।Labels: निजी
10:07 बजे आलोक द्वारा।अब बात चल ही पड़ी है तो अपने जालस्थल रूपी रेल के डब्बों पर दोनो तरफ़ हिन्दी के तमगे लगाने के बारे में भी कुछ।
अगर आपका कोई हिन्दी का जालस्थल नहीं है तो इस प्रविष्टि को नज़रन्दाज़ करें, अगली वाली का इन्तज़ार करें।
1. अपनी हटमल के <head> और </head> वाली चिप्पियों के बीच <meta http-equiv="Content-Type" content="text/html; charset=UTF-8"> चेंप दें। इससे प्लेटफ़ार्म पर मौजूद ब्राउज़रों और पटरी के उस पार मौजूद खोजी कुत्तों को यह पता चलता है कि आपका स्थल यूनिकोड में है।
2. अपनी हटमल के <head> और </head> के बीच <meta http-equiv="Content-Language" content="hi"> भी चेंपें। इससे पटरी की दूसरी तरफ़ मौजूद खोजी कुत्तों को पता चलता है कि आपकी सामग्री हिन्दी में है।
3. अपनी हटमल में हटमल चिप्पी की लैंग विशेषता में बताएँ कि आपके पन्ने की भाषा क्या है। <html lang="hi"> - वैसे <html> वाली चिप्पी तो आपके स्थल पर पहले ही होगी - वह तो आपकी रेल का इंजन है। अगर उसके आगे लैंग वाली विशेषता न दी हो तो उसे जोड़ दें।
4. अगर आप बीच में एकाध अनुच्छेद संस्कृत में चेंपते हैं तो खोजी कुत्तों को सूँघने के लिए कुछ और बू छोड़ें -
<html lang="hi">यहाँ पर कई <p> वाले डब्बे एक <html lang="hi"> वाले डब्बे के अन्दर हैं। पर किसी खास अन्दरूनी डब्बे की भाषा अलग हो तो केवल उसकी भाषा अलग से सुँघाई जा सकती है। इससे प्लेटफ़ॉर्म पर मौजूद यात्रियों - यानी ब्राउज़र में देखने वालों को कुछ खास फ़र्क नहीं पड़ेगा। सभी भाषाओं के कूट उपलब्ध हैं।
अगली बार प्लेटफ़ार्म पर मौजूद यात्रियों के लिए कुछ, क्योंकि वह भी स्टेशन मास्टर को अपने व्यवहार से कुछ बताते हैं।
और हाँ, हटमल किसी खटमल की प्रजाति नहीं है। इसका मतलब है ऍचटीऍमऍल। इस शब्द का ईजाद दिनेशराय जी ने किया है।
यह जानकारी अंग्रेज़ी में भी उपलब्ध है।
नौ दो ग्यारह होने से पहले -
अगर आप चिट्ठा स्वामी हैं तो पहली 3 चीज़ें आपको केवल एक बार अपने खाके में जा के करनी होंगी। चौथी चीज़ का हर प्रविष्टि में खयाल रखना होगा, उसमें भी यदि आप हटमल सम्पादन नहीं करते हैं तो नज़रन्दाज़ कर सकते हैं, क्योंकि "कंपोज़ मोड" में आपको हटमल नहीं दिखेगी।
अब हम होते हैं नौ दो ग्यारह।
09:20 बजे आलोक द्वारा।Labels: निजी
10:08 बजे आलोक द्वारा।पिछले लेख में ऍचटीऍमऍल वैध और अवैध होने की बात लिखी थी तो कुछ लोगों ने इस बारे में और जानना चाहा इसलिए यहाँ लिख रहा हूँ। थोड़ी रेलगाड़ी वाली भाषा में समझाता हूँ। जिन्हें वैध ऍचटीऍमऍल के बारे में पता है वे तब तक इस लेख के नीचे दिए सवाल का जवाब देने का प्रयास करें।
रेल, पटरी पर चलती है। रेल के अन्दर आप चाहें ठंडे डब्बे बनाएँ, गद्दी वाले बनाएँ, सिर्फ़ कुर्सी वाले बनाएँ, या रसोई बनाएँ। शौचालय बनाएँ या चादर तकिए रखने के लिए गोदाम। आपकी मर्ज़ी है। डिब्बों का रंग लाल पीला नीला जो भी रखें, चाहें तो मालगाड़ी के डब्बे लगाएँ। बस दो बातें आपको याद रखनी ज़रूरी हैं - डब्बे के पहिये पटरी के हिसाब से हों, उनमें बने खाँचे पटरी में बैठ जाएँ। उसे आप नहीं बदल सकते, और दूसरा बिजली के तार से छुआने वाली चिमटी - जो इंजन के ऊपर होती है, वह सही तरह से बैठे। डब्बे के अन्दर, बाहर, जो चाहें करें, पर ऊपर और नीचे इन चीज़ों का खयाल रखना ज़रूरी है।
अब रेल के डब्बे के बदले आप अपने जालस्थल को लें, और पटरी व चिमटी(क्या कहते हैं उसे?) को आप मानक मानें। जालस्थल में आप जो भी चाहें लिखें, दिखाएँ, लिखवाएँ, वह दौड़ेगा जब तक आपकी ऍचटीऍमऍल मानक हो। इस स्थल की ऍचटीऍमऍल - को खोल के देखें - View -> Source कर के। आपको सबसे ऊपर एक पंक्ति दिखेगी -
<!DOCTYPE html PUBLIC "-//W3C//DTD XHTML 1.0 Strict//EN" "http://www.w3.org/TR/xhtml1/DTD/xhtml1-strict.dtd">
यह बताता है कि पटरी कौन सी है।
किसी और स्थल पर आपको दूसरे तरह की पंक्ति दिख सकती है - जैसे
<!DOCTYPE HTML PUBLIC "-//W3C//DTD HTML 4.01 Transitional//EN" "http://www.w3.org/TR/html4/loose.dtd">
यह आपको बताता है कि पटरी कौन सी है - छोटी लाइन या बड़ी लाइन। और भी तरह की होती हैं जैसे ऍचटीऍमऍल ट्रांज़िशनल आदि। सभी पटरियों की सूची आपको यहाँ मिलेगी।
इस पंक्ति के बाद ही रेलगाड़ी के डब्बे लगने शुरू होते हैं - <html> से शुरू हो कर। और उन डब्बों का पटरी के अनुरूप होना ज़रूरी है। आखिरी डब्बा होता है </html> ऍचटीऍमऍल रेल से इस तरह थोड़ी अलग है कि यहाँ डब्बों के अन्दर डब्बे होते हैं - जैसे,
<html>
<head>
<title>
शीर्षक
</title>
<body>
और डब्बे और उन डब्बों में बहुत से डब्बे
</body>
</html>
पर आप अपनी मर्ज़ी से डब्बों का नाम नहीं रख सकते, वैध डब्बों का नाम, उसकी डीटीडी यानी डॉक्युमेण्ट टाइप डेफ़िनिशन में होता है। इन सभी पटरियों की माँ है ऍसजीऍमऍल, स्टैण्डर्ड जनरल मार्कप लैंग्वेज। इस के अधीन अलग अलग डीटीडी बना के ऍचटीऍमऍल, डब्लूऍमऍल (वैप फ़ोनों के लिए), और ऍक्सऍमऍल(चिट्ठों की बौछारों के लिए) की पटरियाँ बनाई गई हैं।
इस भाषा में तीन तरह की चीज़ें हैं - डब्बे का नाम, डब्बे की ख़ासियतें और डब्बे के अन्दर का माल।
<a href="http://example.com">उदाहरण</a>
यहाँ पर डब्बे का नाम है a (ऍङ्कर), डब्बे की खासियतें है (खास या ख़ास?) href, और डब्बे के अन्दर का माल है "उदाहरण"।
पटरी का मानक या डीटीडी यह बताता है कि कौन से डब्बे के अन्दर कौन कौन से डब्बे आ सकते हैं, और उनकी क्या क्या खासियतें बताई जा सकती हैं।
किसी पन्ने का ऍचटीऍमऍल सही है या नहीं, यह पता लगाने के लिए एक औज़ार है - वैलिडेटर.डब्लू३.ऑर्ग - इसके अलावा और भी कई औज़ार हैं, जिनसे यह पता लगाया जा सकता है।
अब आपका यही सवाल है न कि ऍचटीऍमऍल मानक न हो तो भी गाड़ी पटरी पर चल कैसे रही थी? चक्कर यह है कि प्लेट्फ़ार्म - यानी ब्राउज़र - और रेलगाड़ियाँ - यानी जालस्थल - पहले बन गए थे, पर पटरियाँ कुछ समय बाद बनीं। इसलिए ये प्लेट्फ़ार्म कंक्रीट के नहीं बने हैं, रबर के हैं, थोड़ी बहुत खींचतान करके भी काम चल जाता है। इतना ही नहीं, प्लेटफ़ॉर्म बनाने वाले ठेकेदार भी अलग अलग हैं - इंटर्नेट ऍक्स्प्लोरर, फ़ायर्फ़ाक्स, सफ़ारी, ऑपेरा और न जाने कितने। सभी को वही गाड़ी अपने प्लेटफ़ार्म पर रुकवानी है तो मानके के हिसाब से रेलगाड़ी को भी चलना होगा और मानक के हिसाब से ही प्लेटफ़ार्म को भी सही आकार देना होगा।
हमें लग सकता है कि ऍचटीऍमऍल अवैध होते हुए भी चल रही थी, पर ज़रा किसी अवैध स्थल को अलग अलग प्लेटफ़ार्मों पर चला के देखिए। वैध ऍचटीऍमऍल सभी पर एक सी दिखेगी, अवैध में थोड़ा फ़र्क दिखेगा। यह भी हो सकता है कि वैध ऍचटीऍमऍल किसी प्लेटफ़ार्म पर ठीक से न दिखे, पर वह अधिकांशतः इसीलिये होता है कि वह प्लेटफ़ार्म ठीक से नहीं बना है। जिस दिन प्लेटफ़ार्म वाले नया उद्धरण ले आएँगे, उस दिन हो सकता है वहाँ गाड़ी की टक्कर होनी शुरू हो जाए।
उम्मीद है इन रबर की पटरियों के बारे में यह जानकारी पर्याप्त होगी। इन प्लेट्फ़ार्मों के अलावा जालस्थलों को मोबाइलों से भी पढ़ा जाता है, और जाल खोजक तथा बौछार खोजक यन्त्र भी इन्हें पढ़ते हैं - वह प्लेट्फ़ार्म से नहीं आते, दूसरी तरफ़ से चढ़ते हैं - पटरी की दूसरी तरफ़ से। पर वांछा उन्हें भी यही होती है कि पटरी के हिसाब से रेलगाड़ी हो।
आशा है अब वैध ऍचटीऍमऍल की आवश्यकता से एक आविष्कार की इच्छा पैदा हो गई होगी। आविष्कार के बारे में आगे। तब तक जाँचिए अपनी रेलगाड़ी को।
अन्ततः एक सवाल - वैलण्टाइन डे पर चूहे ने बिल्ली को क्या कहा?
Labels: अन्तर्जाल, तकनीक, मानक
14:12 बजे आलोक द्वारा।
यूँ तो आधा स लिखने की परंपरा नहीं है लेकिन व्याकरण की दृष्टि से गलत भी नहीं है। बहरहाल उम्मीद है कि गूगल वाले इसे जल्द ठीक कर देंगे।
तब तक खोज के लिए दो बार कंट्रोल दबाएँ।
यह रहा गूगल डेस्कटॉप का हिन्दी जालस्थल - कैसा लगा आपको? आजमा के बताएँ।Labels: क्षेत्रीयकरण, खोज, गूगल, तकनीक
12:10 बजे आलोक द्वारा।पहले लिखा था कि इस चिट्ठे का ऍचटीऍमऍल अवैध है अब काफ़ी माथापच्ची के बाद यह ठीक हो गया है। हाँ टिप्पणियाँ काम खराब कर देती हैं, मगर नौ दो ग्यारह के मुख पृष्ठ की ऍचटीऍमऍल तो वैध है ही। जाँचने के लिए पन्ने पर नीचे दी कड़ी का इस्तेमाल कर सकते हैं जिस पर लिखा है डब्ल्यू ३ सी ऍक्स ऍच टी ऍम ऍल १.०। ऍचटीऍमऍल को वैध करने के कई फ़ायदे हैं, जैसे कि पन्ने मोबाइल आदि में भी सरलता से दिख सकते हैं – यदि ऍक्स ऍच टी ऍम ऍल हो तो। उसके अलावा अलग अलग ब्राउज़रों में भी एक समान दिखेगा पन्ना। अब हम होते हैं नौ दो ग्यारह। यह लेख मैं डाक से भेज रहा हूँ, देखता हूँ ठीक से पहुँचता है या नहीं।
14:07 बजे आलोक द्वारा।
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