मैं ये सोच रहा था कि http://devanaagarii.net को बनाते समय मुझे जो अनुभव हुए, क्यों न उनके बारे में कुछ लिखा जाए, ताकि दूसरों को भी लाभ मिले। |
| अव्वल तो यह कि आप अपने स्थल के लिए डोमेन नाम ले लें। माना कि जियोसिटीज़, या ब्लॉग्स्पॉट, या लाइव्जर्नल आपकी सभी ज़रूरतों को पूरा कर देता है, लेकिन लोग आपको गम्भीरता से लेना तभी शुरू करेंगे जब आपका अपना डोमेन हो। डोमेन लेने का अर्थ है कि आपको अपने स्थल पर इतना विश्वास है कि आप उसमें अपना पैसा डालने की हिम्मत रखते हैं। या फिर, कोई आपके स्थल की सामग्री को इतना महत्वपूर्ण समझता है कि उसके डोमेन के लिए पैसे देने को तैयार हो गया है। यह ज़्यादा महँगा नहीं है, कुछ १८० रुपए में भी आपको डोमेन नाम मिल सकता है, साल भर के लिए। मैं फ़िलहाल अपने स्थल के लिए शायद कुछ १४०० रुपए सालाना देता हूँ। यानी कि कुछ सात बार पिक्चर देखने का भाव। |
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दरअसल हुआ यूँ कि पहले मेरा एक जालस्थल था, जियोसिटीज़ पर। अभी भी है, उसमें कुछ सीमा थी कि मैं अमुक मात्रा से ज़्यादा सामग्री नहीं डाल सकता हूँ, साथ ही, उस स्थल के प्रदर्शन में भी कुछ बन्धन थे बैण्डविड्थ के। पर मैंने ३,४ जियोसिटीज़ के खाते ले के काम चलाया, विषयों के अनुसार। फिर, मैंने अपना चिट्ठा लिखने की सोची, ब्लॉग्स्पॉट पर, जब ये ख़बर आई कि ब्लॉग्स्पॉट को गूगल ने खरीद लिया है, इस ओर दिलचस्पी बढ़ी। उस समय फ़ारसी के चिट्ठों की बहुत चर्चा थी, तो मैंने सोचा कि हम भी लिखें। अब, ब्लॉग्स्पॉट पर सुविधा थी कि या तो आप अपना चिट्ठा ब्लॉग्स्पॉट पर रख लें या अपने स्थल पर ऍफ़ टी पी कर दें। तब तक तो मुझे पता ही नहीं था कि अन्तर्जाल पर जो स्थल हैं, उन पर ऍफ़ टी पी कर के सामग्री चढ़ाई भी जा सकती है, पर वह अलग बात है। तो मैं ढूँढने लगा कि अपने जियोसिटीज़ स्थल पर ऍफ़ टी पी कैसे की जाए। पता चला कि ऍफ़ टी पी की सुविधा पाने के लिए कुछ पैसे देने पड़ेंगे। अब सवाल ये आया कि जियोसिटीज़ पर स्थल रखें और उसके पैसे भी दें, उससे अच्छा तो यही है कि अपना डोमेन ही ले लिया जाए। बाद में देखा कि उसके अन्य फ़ायदे भी हैं, जैसे कि लोग स्थल का नाम आसानी से याद रख पाते हैं, और बैण्डविड्थ तथा फ़ाइलों की मात्रा की सीमा अधिक होने की वजह से ज़्यादा सामग्री भी आ गई। हर बार हिचक हिचक के काम करने की ज़रूरत नहीं रही। यदि आप कुछ छः महीने से अधिक अपने ब्लॉग्स्पॉट या जियोसिटीज़ वाले स्थल पर लगे हुए हैं, तो डोमेन नाम लेने में न हिचकिचाएँ। आप पछताएँगे नहीं। |
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यदि आपको ज़्यादा धाँसू चीज़ें नहीं करनी हैं, तो मेरी सलाह है कि अपने शहर की ही किसी दुकान से लें, और वह भी तब यदि आपके किसी दोस्त ने पहले ही वहाँ से ले रखी हो। इस धन्धे में और आलू प्याज़ के धन्धे में अब ज़्यादा फ़र्क नहीं रह गया है, लोग बड़े बड़े ऐलान तो करते हैं, लेकिन जाएँ वहीं जहाँ के बारे में किसी और का पहले ही अच्छा अनुभव हो। |
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स्थल की सामग्री ही उसकी जान है, उसके बगैर तो वह केवल दीवारों व छत वाला मकान है। आप जिस विषय पर स्थल बना रहे हैं, उसके बारे में सामग्री स्थल में लगातार बढ़ाते जाइए। चाहे पन्ना दर पन्ना ही सही। शुरू में आपका जोश ज़्यादा होगा, समय भी, और बाद में कम। पर इतना ठान लें कि आप हर रोज कम से कम एक पन्ने की सामग्री तो अपने स्थल पर जोड़ेंगे ही। कुछ भी लिखते समय यह न सोचें कि यार जालस्थल पर यह डालना ठीक रहेगा क्या, यह तो कहीं भी नहीं है। भई जाल को ज़रूरत ही उसी चीज़ की है जो अभी तक वहाँ पहुँची नहीं है। तो हर रोज एक पन्ना जोड़ें। यदि आप ऐसा करते गए तो साल भर में आपके पास साढ़े तीन सौ पन्ने का जालस्थल होगा। और आप बताएँ, आप कितने स्थलों को जानते हैं, जिनमें तीन सौ से अधिक पन्ने हों? |
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आपके स्थल में भ्रमण सरल होना चाहिए, और लोगों को स्थल पर पहुँचते ही पता चल जाना चाहिए कि यहाँ पर उन्हें क्या मिल सकता है। तभी तो आप अपने यहाँ लोगों को आकर्षित कर पाएँगे। अपने स्थल के जितने भी यूआरऍल हैं, उन्हें सरल रखें। किसी भी पन्ने को दो या तीन स्तर के नीचे न टपकने दें। उदाहरणार्थ, डोमेन.कॉम/विषय१/विषय२/मसला । बल्कि सबसे अच्छा तो यही होगा कि आप डोमेन.कॉम/विषय१ तक ही सीमित रखें, यानी लम्बे पतों से बचें। यूआरऍलों में .php, .asp, .shtml, .html आदि से बचें। ऐसे यूआरऍल याद रखने में तो मुश्किल होते ही हैं, साथ ही यदि आप अपने स्थल की प्रोग्रामिङ्ग बदलते हैं तो आपको पता भी बदलना पड़ेगा, जो कि आगन्तुकों को व्यथित करेगा। स्थल में ऊपर नक्शा बनाने की कोशिश करें, ताकि लोगों को पता रहे कि आगे पीछे क्या है। साथ ही, लम्बे पन्नों से बचें। जहाँ तक हो सके ऐसा करें कि आगन्तुकों को दाएँ या नीचे जाना न पड़ें। यदि सामग्री अधिक हो तो अगले पन्ने की कड़ी प्रदान करें। इससे पन्ने छोटे भी होंगे, अतः वे जल्दी प्रदर्शित होंगे। |
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लोग आपके स्थल में जो सामग्री है, उसे पाने को तत्पर हैं, लेकिन वे जानते नहीं हैं कि आपका स्थल इस दुनिया में मौजूद है। इसलिए अपने स्थलों को खोजकों व उनके रोबोटों के लिए सुगम बनाएँ। ऐसा करने के लिए कुछ नुस्खे यहाँ बताता हूँ।
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अपने स्थल की सामग्री किसी से पढ़वाएँ। उनसे पूछें, कुछ अटपटा लगता है क्या? कहीं व्याक्य रचना ग़लत है? कोई वर्तनी ग़लत है? यदि ऐसा है तो इस सब को ठीक करिए। वर्तनी की ग़लतियों से लगता है कि जल्दीबाज़ी में काम हुआ है, और स्थल पर दी जानकारी की सत्यता पर भी लोगों को सन्देह होने लगता है। बोलचाल की भाषा में लिखें। न क्लिष्ट न अशुद्ध। |
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अपने स्थल के चिट्ठों की मदद से अपने आगन्तुकों पर नज़र रखें। वे कौन से खोजकों की मदद से खिंचे आते हैं? किन शब्दों की खोज पर वे आपके पास पहुँचे? उसके हिसाब से उन विषयों या उपविषयों पर अधिक सामग्री प्रदान करने का प्रयास करिए। देखें, कि वे कौन से स्थलों से आ रहे हैं। यदि वे स्थल आपके स्थल के विषय से मिलते जुलते हैं, तो उनसे सम्बन्धित कड़ियाँ भी अपने स्थल पर डालें। क्या लोगों को बहुत सारे ४०४ मिल रहे हैं? हो सकता है कि कहीं कोई कड़ी ग़लत हो, उसे ठीक करें, या जिस स्थल पर यह ग़लत कड़ी हो उन्हें ठीक करने का अनुरोध डाक से भेजें। यदि कोई आगन्तुक आपके स्थल में कोई ग़लती बताता है तो उसे तुरन्त ठीक करके धन्यवाद का पत्र या टिप्पणी लिखें। इससे आपके स्थल में सुधार तो होगा ही, आगन्तुकों का अच्छा समुदाय भी बनेगा। |
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ये थे कुछ नुस्खे। आपके पास और हों तो बताइए। उम्मीद है कि अन्तर्जाल पर आनन्द मङ्गल का माहौल बना रहेगा। अच्छे स्थल बनाने के साथ साथ ज़रूरी है कि हिन्दी के जालस्थलों के बारे में लोगों को पता चले, क्योंकि यदि प्रयोक्ताओं का समुदाय होगा तो स्थलों की गुणवत्ता व सङ्ख्या अपने आप बढ़ेगी। और साथ ही, यदि आपके भी कोई अच्छे अनुभव हों तो बताएँ। इस लेख पर टिप्पणी करें। |
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